बरसों से जो शख़्स फ़ोन करके ‘रॉन्ग नंबर’ कहकर फ़ोन रख देता था, वह कोई और नहीं–

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’,हरदा, मध्य प्रदेश

वे शामें अब भी मेरी रूह पर उकेरी हुई हैं, जब वक्त जैसे थम सा जाता था और यादों के चिराग खुद-ब-खुद जलने लगते थे। इतने साल बीत गए, उम्र का परिंदा न जाने कितने मौसमों की उड़ान भर चुका है, लेकिन ज़हन के किसी कोने में उसके अहसास की आँच आज भी उतनी ही तेज़ है जैसे कल ही की बात हो। मेरे पास उसका संपर्क (नंबर) मौजूद है,एक ऐसा संपर्क जो अतीत और वर्तमान के बीच एक पतली सी डोर की तरह टिका हुआ है। लेकिन जब भी दिल-ए-नादान को धड़का कर वह नंबर मिलाता हूँ और दूसरी तरफ से उसकी मासूम आवाज़ उभरती है,”कौन?”तो मेरी हिम्मत जवाब दे जाती है। होंठ सिल जाते हैं, और दिल की तमाम इल्तजाएँ (प्रार्थनाएँ) महज़ एक जुमले में समेट कर कह देता हूँ “माफ़ कीजिएगा, रॉन्ग नंबर!” मुझे कोई हक़ नहीं बनता कि उसकी हँसती-खेलती, पुरसकून जिंदगी के दरपे होकर उसकी दुनिया में बिछड़ने का कोई तूफ़ान बरपा करूँ। शायद वक्त की बेरहम रफ़्तार ने उसे बदल दिया हो, शायद वह ज़िंदगी की नागुज़र (अनिवार्य) हक़ीक़तों से रूबरू हो चुकी हो। लेकिन मेरे दिल के आईने में वह आज भी वही कमसिन सी, शोख़ व चंचल छात्रा लगती है जो वर्षों पहले थी। यह कहानी एक ऐसी हसीन वादी के आगोश में बसे क़दीम (प्राचीन) गाँव की है, जहाँ ऊँचे बर्फ़ीले पहाड़ों से उतरती हवा चिनार के पत्तों से सरगोशियाँ (फुसफुसाहट) करती थी। गाँव के मोड़ पर, जहाँ पाइन और देवदार के पेड़ों के झुंड ख़त्म होते थे, वहाँ वह पुराना और ऐतिहासिक स्कूल का भवन स्थित था। ईंटों की बोसीदा (जर्जर) दीवारें, लकड़ी की पुरानी खिड़कियाँ और बरामदों पर फैली हुई ज़र्द (पीली) व लाल रंग की बेलें उस इमारत को एक तिलिस्मानी जादू बख्शती थीं।

सुबह के वक्त जब धुंध पहाड़ों की ओट से उतर कर स्कूल के विशाल प्रांगण को अपनी आग़ोश में लेती, तो सूरज की पहली किरणें खिड़की के शीशों पर यूँ मुनक्किस (परावर्तित) होतीं जैसे अतीत का कोई पन्ना खुल रहा हो। मैं वहाँ बतौर शिक्षक शैक्षणिक सेवाएँ दे रहा था, और वह मेरी क्लास की एक छात्रा थी। उसकी पहली नज़र का तीर जब दिल के पार हुआ, तो दर्द की एक ऐसी लहर उठी जिसने मोहब्बत को जन्म दिया। वह नज़र महज़ नज़र नहीं थी, एक ख़ामोश इक़रार थी, एक ऐसी चुभन थी जो लम्हा-ब-लम्हा रूह को महकाने लगी। फिर अध्यापन का सिलसिला बढ़ा, वह मुझसे ट्यूशन पढ़ने लगी। मैं उसको पढ़ाने पाबंदी से जाने लगा, मैं  वक्त का पाबंद हो गया था, वक्त से पहले तैयार होकर कई बार खुद को आईने में देखता था,जब बाहर बरसात की बूँदें उसके घर की छत पर जलतरंग बजातीं, तो हम दोनों के बीच किताबों के पन्नों से परे दिल की बातें होने लगतीं। उसका छूना, उसके स्पर्श (लम्स) का वह पिघला देने वाला असर मेरी रूह को मोम की तरह ढालने लगा। उसकी मासूम आँखों में, जो मेरी आँखों में अपना पूरा जहाँ तलाश करती थीं, सच्ची वफ़ादारी और आत्मसमर्पण का वह समंदर था जो इंसान को हर मोड़ पर बिखरने से बचा लेता है। एक शाम, जब वादी पर शफ़क़ की सुर्ख़ रंगत फ़ैल रही थी, मैंने उसके हाथ अपने हाथों में लेकर इज़हार-ए-वफ़ा किया था। उसने भीगी आँखों और लरज़ते (काँपते) होंठों से कहा था, “अगर आप  मेरे न हुए, तो मैं  जी नहीं पाऊँगी…” लेकिन मोहब्बत और मुश्क़ (कस्तूरी की ख़ुशबू) को भला कौन छुपा सका है? हमारे इश्क़ की महक आहिस्ता-आहिस्ता स्कूल के दहलान से निकल कर गाँव की हवाओं में फ़ैल गई। कदाचित् सामाजिक दृष्टिकोण भारी हो गया, तरह-तरह की बातें होने लगीं और फिर वही वक्त आया जिसका डर हमेशा रहता था। हमारे बीच रस्मों, रिवाजों और ख़ानदान की फौलादी बंदिशें आ खड़ी हुईं। मिलने के तमाम रास्ते एक-एक करके बंद कर दिए गए।


वक्त का बेरहम पहिया चलता रहा और दोनों की तक़दीर के फ़ैसले अलग-अलग दिशाओं में हो गए। ख़ानदानी ज़िम्मेदारियों और सामाजिक मर्यादाओं के आगे सिर झुकाते हुए आख़िरकार मेरी भी शादी कर दी गई, और वह भी किसी और के नाम की मेंहदी अपने हाथों पर रचाकर दूर एक नए शहर रुख़सत हो गई। हालाँकि फ़ासलों की एक लंबी दीवार हमारे बीच हाइल हो चुकी थी, लेकिन मेरे दिल का निगहबान हर लम्हा उसकी ख़बर रखता था। मुझे मालूम था कि उसकी शादी पुलिस के एक बावक़ार, दफ़्तरी कामकाज तक सीमित रहने वाले इंस्पेक्टर से हुई है। वह दूर शहर में अपने घर की चारदीवारी में ज़िंदगी गुज़ार रही थी, मगर मेरी निगाह-ए-शौक़ छुपकर ही सही, उसके हाल से बाख़बर रहती। मैंने भी अतीत के उन तमाम सायों और यादों से फ़ुरक़त (निजात) पाने के लिए वह पुराना शहर और अध्यापन की नौकरी हमेशा के लिए छोड़ दी और भोपाल स्थानांतरित हो गया। ज़िंदगी को एक नई डगर पर डालने के लिए मैंने अपनी पत्नी के साथ होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया। दिन-रात की दौड़-धूप, मोटी-मोटी मेडिकल किताबों के पन्ने, दवाओं की बारीकियाँ और अस्पताल की व्यस्तता मैंने ख़ुद को पढ़ाई के अंतहीन सिलसिले में पूरी तरह ग़र्क कर लिया ताकि ज़हन को सुकून मिल सके। लेकिन यह दिल भी कितना अजीब मुजस्समा (पुतला) है…


दिन भर नुस्खे लिखते हुए, दवाओं के गुणों का अध्ययन करते हुए या पत्नी के साथ सामान्य ज़िंदगी की बारीकियाँ बुनते हुए, ज़हन जब भी ज़रा सा फ़ारिग (ख़ाली) होता, वही पहला स्पर्श, वही स्कूल के बरामदे और वही मासूम निगाहें फ़िर से सामने आ खड़ी होतीं। भोपाल की झीलों पर जब शाम का धुँधलका फैलता, तो मेडिकल किताबों पर लिखी पंक्तियाँ धुँधला जातीं और उनकी जगह उसका पहला इज़हार-ए-वफ़ा उभर आता। सच ही तो है, पहली मोहब्बत कोई शारीरिक सफ़र नहीं जो मंज़िल पर पहुँच कर ख़त्म हो जाए… यह तो रूह में उतरा हुआ वह पहला हर्फ़ है, जिसे ज़िंदगी की तमामतर व्यस्तता, डिग्रियाँ और नए रिश्ते भी मिटा नहीं पाते। बरसों की मुसाफ़िरत और वक्त की गर्द जब हर नक़्श को धुँधला चुकी थी, तब क़िस्मत ने एक ऐसा मोड़ लिया जिसका तसव्वुर शायद ख़्वाब में भी मुमकिन न था। उसके पति का तबादला उसी शहर में हो गया जहाँ मैं अपना होम्योपैथिक क्लिनिक स्थापित करके एक पुरसकून और बावक़ार जिंदगी गुज़ार रहा था। शहर वही था, मगर मैं अपनी रोज़मर्रा की जाँच, मरीजों की क़तारों और नुस्ख़ा-नवीसी की दुनिया में गुम था। एक दोपहर, जब क्लिनिक का शोर थम चुका था और धूप खिड़की के शीशों पर सुस्ती से फैल रही थी, क्लिनिक का दरवाजा हिला। मैंने बिना नज़रें उठाए, सामान्य रूप से मरीज की फ़ाइल पर कुछ लिखते हुए कहा “तशरीफ़ रखिए, बताइए क्या तक़लीफ़ है?”


कोई आवाज़ न आई… सिर्फ़ एक हल्की सी, जानी-पहचानी साँसों की महक हवा में घुलने लगी। वह महक जो बरसों पहले गाँव के स्कूल की ख़ामोश राहदारियों में मेरी रूह को छू जाती थी। मैंने गर्दन उठाई, और वक्त जैसे यकलख्त (अचानक) ठहर गया।
वह मेरे सामने खड़ी थी… न वह अब स्कूल की मासूम, डरी हुई छात्रा थी, और न ही अतीत की वह भावुक लड़की। उसके चेहरे पर एक ठहराव था, एक बावक़ार परिपक्वता, जिसमें अतीत के तूफ़ान कहीं गहरे समंदर की तरह तलहटी में बैठ चुके थे। वह पुलिस इंस्पेक्टर की पत्नी के रूप में एक संभ्रांत महिला बन चुकी थी, लेकिन उसकी आँखों में वही पुरानी रोशनी थी,एक अजीब, नया अंदाज़! न कोई आह-ओ-ज़ारी हुई, न अतीत का कोई शिक़वा, और न ही चेहरे पर घबराहट। वह धीरे से मुस्कुराई, और इतनी सादगी से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई जैसे हम कल ही तो मिले थे। “डॉक्टर साहब…” उसने एक नया, शोख़ मगर गंभीर अंदाज़ अपनाया, “सुना है आपके पास हर पुराने और अनदेखे दर्द का इलाज होता है? एक इलाज मेरा भी कर दीजिए।” उसके इस अंदाज़ ने मेरे सारे सब्र के बंधन तोड़ दिए। मैंने नुस्ख़ा लिखने वाला क़लम हाथ में थामे रखा, मगर उँगलियों की कँपकँपी को छुपाना मुश्किल हो गया। “कौन सा दर्द?” मैंने नज़रें झुका कर, अपनी आवाज़ को सँभालते हुए पूछा। “वही…” उसने आहिस्ता से अपनी कलाई की नब्ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाई, “वही दर्द जो न दवा से जाता है, न दुआ से… जिसका राज़दार सिर्फ़ एक ‘रॉन्ग नंबर’ का फोन हुआ करता था!” मैंने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक तबस्सुम (मुस्कुराहट) था,वह सब जानती थी! वह जानती थी कि बरसों से जो शख़्स फ़ोन करके ‘रॉन्ग नंबर’ कहकर फ़ोन रख देता था, वह कोई और नहीं बल्कि वही  था जिसने उसे कभी वफ़ा का सबक पढ़ाया था।


उस पहली अप्रत्याशित मुलाकात के बाद, जिंदगी ने एक अजीब मगर बेहद ख़ामोश मोड़ ले लिया। उनका उस शहर में ठहराव लंबा था, और यूँ कुछ अरसे के अंतराल से उसका क्लिनिक आना एक नियम सा बन गया। वह जब भी आती, दवा के बहाने दोपहर के उस वक्त का चुनाव करती जब मरीजों की भीड़ छँट चुकी होती। ये मुलाक़ातें किसी ग़ुनाह या ख़यानत (बेवफ़ाई) की मरहूम-ए-मिन्नत नहीं थीं, बल्कि ये दो ऐसी रूहों का मिलन थीं जो ज़िंदगी की सख़्तियों और ज़िम्मेदारियों के सफ़र में थक चुकी थीं और एक-दूसरे के पास चंद लम्हों का सुकून तलाश करती थीं। इन मुलाक़ातों का राज़ सिर्फ़ उन दोनों के दिलों में दफ़्न था। उसका पति,जो एक दफ़्तरी पुलिस अफ़सर था,अपनी दफ़्तरी दुनिया, फ़ाइल-नवीसी और अनुशासन के दायरे में मग्न था और उसकी इस आध्यात्मिक दुनिया से बिल्कुल बेख़बर था। दूसरी तरफ़, मेरी पत्नी जो मेडिकल की दुनिया और घर की ज़िम्मेदारियों में व्यस्त थीं, उन्हें भी इस पुराने और पाकीज़ा ताल्लुक का कोई ज्ञान न था। लेकिन ये मुलाकातें कोई आम मुलाकातें नहीं थीं… इनमें न तो अब अतीत को वापस पाने की कोई तड़प थी, न अपने-अपने जीवनसाथी के साथ किसी प्रकार की बेवफ़ाई का साया। हम जब भी बैठते, अतीत की यादों पर हसरत से रोने के बजाय एक बावक़ार मुस्कुराहट के साथ उनका ज़िक्र करते। वह अपने घर और पति के किस्से इतनी सादगी से सुनाती जैसे कोई पुरानी दोस्त अपने हाल से बाख़बर कर रही हो, और मैं अपने अस्पताल, मरीजों और जिंदगी की उलझनों का हाल बयान करता। एक दिन, जब वह क्लिनिक से जाने लगी, तो उसने दराज़ पर रखी होम्योपैथिक दवा की शीशी उठाई और मुस्कुरा कर कहा: “डॉक्टर साहब! इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा इलाज दवा नहीं… बल्कि यह अहसास है कि इस दुनिया में कोई एक शख़्स ऐसा भी है जो उसे बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी माँग के, बिल्कुल पाकीज़गी से चाहता है।”
उस दिन के बाद, हमने कभी एक-दूसरे के निज़ि दायरों में क़दम नहीं रखा। हम न तो छुप-छुप कर फ़ोन पर घंटों बातें करते थे और न ही रातों को आहें भरते थे। बस महीने में एक-आध बार, दवा की शीशी के बहाने वह चंद लम्हों की मुलाक़ात हमारे लिए पूरे महीने की थकान उतारने और जिंदगी जीने का संबल बन जाती। हमारी मोहब्बत अब वह बेक़ाबू तूफ़ान नहीं रही थी जो कभी गाँव के स्कूल की इमारत से शुरू हुआ था और जिसे दुनिया के डर से छुपना पड़ता था। वह अब एक पारदर्शी, ख़ामोश और पाकीज़ा दरिया की मानिंद बन चुकी थी,जो बिना शोर मचाए, अपने किनारे क़ायम रखते हुए, अपनी-अपनी मंज़िल की तरफ़ बहता जा रहा था।

ना तलब कोई, ना शिकवा, ना तकाज़ा है अब, दिल के उस मोड़ पे पाकीज़ा सा रिश्ता है अब।

वक़्त ने राह बदल दी मगर अहसास वही, दो किनारों में भी बहता हुआ दरिया है अब।

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