छोटे-छोटे बच्चों पर हमला क्यों? सरकार का क्रूर चेहरा और सरकार पर इसके दूरगामी असर

‘छोटे-छोटे बच्चों पर हमला क्यों?’ यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि हमारे पूरे समाज और शासन व्यवस्था से है। बीजेपी और आरएसएस को यह समझना होगा कि केवल सत्ता में बने रहना या चुनाव जीतना ही राष्ट्र निर्माण नहीं है। यदि देश का बच्चा खुद को असुरक्षित महसूस करता है, तो हर विकास दर और हर भव्य इमारत बेमानी है।

किसी भी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके बच्चे होते हैं। बच्चे न केवल देश का भविष्य हैं, बल्कि वे उस मासूमियत और सुरक्षा के प्रतीक भी हैं जिसे बचाए रखना हर सरकार, व्यवस्था और नागरिक का परम कर्तव्य है। लेकिन जब राजनीति, वैचारिक उग्रता और प्रशासनिक विफलता की आंच इन मासूमों तक पहुँचने लगे, तो समाज के अंतःकरण पर गहरा आघात लगता है। हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, स्कूली स्तर पर वैचारिक मतभेदों के कारण उत्पीड़न और विरोध प्रदर्शनों के दौरान मासूमों पर पुलिसिया कार्रवाई जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इन घटनाओं ने सीधे तौर पर केंद्र और कई राज्यों में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की नीतियों और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि यह सत्ता का एक क्रूर चेहरा है, जो अब बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रहा है।

हम बच्चों पर हमलों की बात करते हैं, तो इसका दायरा केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई मानसिक और सामाजिक पहलू भी हैं। नागरिकता संशोधन कानून (CAA), किसान आंदोलनों या स्थानीय स्तर पर हुए विभिन्न विरोध प्रदर्शनों के दौरान ऐसी तस्वीरें सामने आईं जहाँ पुलिसिया कार्रवाई की चपेट में छोटे बच्चे भी आए। आँसू गैस के गोले और लाठीचार्ज के बीच फँसे बच्चों की तस्वीरों ने सरकार की संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े किए। कई बीजेपी शासित राज्यों में बच्चों के भोजन और पोषण से जुड़े फैसलों पर वैचारिक राजनीति हावी दिखी। अंडे या विशिष्ट पोषण तत्वों को आहार से हटाने के फैसलों को आलोचकों ने बच्चों के स्वास्थ्य से ज्यादा वैचारिक एजेंडे को थोपने की कोशिश माना। पाठ्यक्रम में बदलाव, इतिहास के पुनर्लेखन और स्कूलों में धार्मिक व वैचारिक ध्रुवीकरण के प्रयासों ने बच्चों के कोमल मन पर गहरा असर डाला है। उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के स्कूलों से ऐसी दुखद घटनाएँ भी सामने आईं जहाँ शिक्षकों या सहपाठियों द्वारा बच्चों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर प्रताड़ित किया गया।

विपक्ष और आलोचकों का तर्क है कि आरएसएस और बीजेपी की कार्यशैली में “सहानुभूति” की जगह “वैचारिक कठोरता” ने ले ली है। इस नैरेटिव के पीछे निम्नलिखित मुख्य बिंदु हैं। आलोचकों का कहना है कि आरएसएस का राष्ट्रवाद का मॉडल इतना कठोर है कि वह मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ देता है। जब सत्ता अपने एजेंडे को लागू करने के लिए आतुर होती है, तो वह यह भूल जाती है कि उसकी नीतियों का सबसे कमजोर तबके (बच्चों) पर क्या असर पड़ रहा है। जब भी किसी बीजेपी शासित राज्य में बच्चों के साथ अन्याय या हिंसा की घटना होती है, तो प्रशासन का पहला रुख अक्सर बचाव का या घटना को दबाने का होता है। हाथरस या कठुआ जैसी पुरानी घटनाओं से लेकर हालिया मामलों तक, सरकार पर आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण देने या मामले को मोड़ने के आरोप लगते रहे हैं। सोशल मीडिया पर सत्ता पक्ष के समर्थकों द्वारा अक्सर ऐसी घटनाओं को न्यायसंगत ठहराने या पीड़ितों को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जाता है, जिसे आलोचक आरएसएस-बीजेपी के ‘क्रूर और संवेदनहीन चेहरे’ के रूप में पेश करते हैं।

बच्चों से जुड़ी कोई भी अप्रिय घटना सीधे तौर पर परिवार और समाज के दिल पर चोट करती है। राजनीति में आर्थिक नीतियां या भ्रष्टाचार के मुद्दे शायद समय के साथ धुंधले पड़ जाएं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा से समझौता एक ऐसा मुद्दा है जिसे देश की जनता कभी माफ नहीं करती। इसके दूरगामी असर निम्नलिखित हो सकते हैं। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी नैतिक साख होती है। जब सरकार पर “बच्चों के प्रति क्रूर” होने का ठप्पा लगता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख खो देती है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे खोखले प्रतीत होने लगते हैं। बीजेपी की चुनावी सफलताओं में महिला मतदाताओं (साइलेंट वोटर) की बहुत बड़ी भूमिका रही है। महिलाएं परिवार और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखती हैं। यदि उन्हें लगेगा कि वर्तमान शासन व्यवस्था में उनके बच्चे सुरक्षित नहीं हैं, तो यह वोट बैंक पूरी तरह खिसक सकता है। आज का युवा सोशल मीडिया पर सक्रिय है और वह अन्याय को करीब से देख रहा है। बच्चों पर होने वाले अत्याचार और उस पर सरकार की निष्क्रियता युवाओं को व्यवस्था के खिलाफ खड़ा कर सकती है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्तातंत्र निरंकुश और संवेदनहीन हुआ है, तब-तब जनता ने उसे सत्ता से बेदखल किया है। 1977 में जनता ने इंदिरा गांधी की मजबूत सरकार को सिर्फ इसलिए उखाड़ फेंका था क्योंकि शासन ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके परिवारों पर चोट की थी (जैसे जबरन नसबंदी)। 2012 में हुए निर्भया कांड ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नींव हिला दी थी। कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के मोर्चे पर विफलता के कारण जनता में ऐसा आक्रोश पैदा हुआ कि 2014 में सरकार बदल गई। यदि बीजेपी और आरएसएस ने अपनी नीतियों में सुधार नहीं किया, जमीनी स्तर पर कानून का शासन स्थापित नहीं किया और अपने कार्यकर्ताओं व प्रशासन को संवेदनशील नहीं बनाया, तो बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा जन-आक्रोश एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है। लोकतंत्र में जनता का धैर्य असीम होता है, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला जाए, तो बड़े-से-बड़े साम्राज्य ढह जाते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि हर घटना को सीधे तौर पर शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व या किसी संगठन की साजिश के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। कई बार घटनाएँ स्थानीय पुलिस की नाकामी, व्यक्तिगत विकृति या प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम होती हैं, न कि किसी केंद्रीय वैचारिक एजेंडे का। सरकार के समर्थकों का तर्क है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में बच्चों के खिलाफ अपराधों के लिए पोक्सो (POCSO) कानून को और कड़ा किया गया है और अपराधियों को फांसी तक की सजा का प्रावधान किया गया है। बच्चों से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने के बजाय सभी दलों को मिलकर एक सुरक्षित माहौल बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

‘छोटे-छोटे बच्चों पर हमला क्यों?’ यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि हमारे पूरे समाज और शासन व्यवस्था से है। बीजेपी और आरएसएस को यह समझना होगा कि केवल सत्ता में बने रहना या चुनाव जीतना ही राष्ट्र निर्माण नहीं है। यदि देश का बच्चा खुद को असुरक्षित महसूस करता है, तो हर विकास दर और हर भव्य इमारत बेमानी है। सरकार पर इसके दूरगामी असर निश्चित रूप से गंभीर होंगे। यदि समय रहते न्याय नहीं मिला, दोषियों को कड़ा सबक नहीं सिखाया गया और समाज में व्याप्त नफरत को कम नहीं किया गया, तो जनता का यही आक्रोश आने वाले चुनावों में इस सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश के बच्चों का भविष्य और उनकी सुरक्षा अक्षुण्ण रहनी चाहिए। यह समय सरकार के लिए आत्ममंथन करने और अपने क्रूर होते जा रहे प्रशासनिक तंत्र को मानवीय चेहरा देने का है, अन्यथा इतिहास किसी को माफ नहीं करता।

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