आज देश के छात्रों के साथ खड़े नहीं होने का कोई भी कारण, आपकी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता या आपकी बुद्धिमत्ता से भरी तार्किकता नहीं,आपकी कायरता कहलाएगी। आप भले किसी भी धारा, जाति, दल और विचारधारा के हों. छात्रों के लिए बोलिए, क्योंकि जुल्म सहने वाले छात्रों को नहीं पता कि उनके अगल – बगल या मंच पर किस दल या धारा के लोग हैं और कौन उनके साथ कितनी प्रतिबद्धता से साथ खड़ा रहेगा?

आइये अपने घर के बेटे बेटियों के साथ संवेदना रखिये, यही आज के छात्र हैं, कल के छात्र होंगे। आंदोलन में पुलिसिया बर्बरता का विरोध करिए, छात्रों के साथ खड़ा होइए। अगर आप आज भी किसी वाद या विचारधारा या दल की गुलामी निभाते हुए चुप रह गए या छात्रों के प्रति घृणा दिखाते रह गये तो वर्तमान भले आपको सोशल मीडिया पर बढ़त दिला देगा, लेकिन भविष्य आपको माफ़ नहीं करेगा। आइए, मरी हुई चेतना को जागृत करिए। छात्र पारदर्शी परीक्षा और बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए सड़क पर हैं,उनसे कोई चालबाजी मत करिए। छात्र हर तरफ से पिट रहा, उसको सरकार मार रही प्रशासन मार रहा, राजनीति मार रही, उसका नेतृत्व भी छल रहा, उसके आसपास का समाज भी ताना दे रहा। आखिर छात्र करे क्या? क्यों देश के बुद्धिजीवी छात्र के मुद्दे का राजनीतिकरण कर छात्रों का मूल मुद्दा गायब कर देते हैं।कोई छात्रों को किसी दल का बता रहा,कुछ न्यूज चैनल दुश्मन देश की साजिश बता दे रहे,ये अन्याय है छात्रों के साथ।किसी को मनुवाद से दिक्कत है तो किसी को वामपंथ से…सारे विरोध करिए,लड़ते रहिये ये अंतहीन लड़ाई,लेकिन इसके बीच में छात्रों को मत पिस दीजिए।

हर विरोध को “नौटंकी” और हर असहमति को विपक्ष की साजिश बताना भी समस्या का समाधान नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना और अपनी मांगों के लिए आवाज उठाना नागरिकों का अधिकार है। अगर किसी मुद्दे पर सरकार से सवाल हो रहे हैं, तो उनका जवाब तथ्यों और संवाद से दिया जाना चाहिए, न कि प्रदर्शनकारियों को अपमानित करके। NEET परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर भी गंभीर सवाल उठे थे, और इस पूरे विवाद का छात्रों की मानसिक स्थिति पर भी गहरा असर पड़ा। अगर किसी छात्र ने परीक्षा व्यवस्था से जुड़े तनाव या अनियमितताओं के कारण अपनी जान गंवाई है, तो उस मुद्दे को सिर्फ राजनीति कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही जरूरी है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन छात्रों और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से सुनना सरकार और विपक्ष—दोनों की जिम्मेदारी है। विरोध करना लोकतंत्र का अधिकार है,लेकिन किसी भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाना और हर चुनाव में उसे हराने की बात करना—दोनों अलग बातें हैं। अगर NEET जैसी गंभीर घटनाओं पर सरकार से जवाबदेही मांगी जा रही है, तो मुद्दे पर बात होनी चाहिए, न कि उसे राजनीतिक नारे में बदल देना चाहिए। जनता का वोट किसी पार्टी को हराने के लिए नहीं, बल्कि बेहतर विकल्प चुनने के लिए होना चाहिए। बहोत पहले लिखे थे और फिर आज लिख रहे है – अब राजा के बेटा राजा न बनेगा
अगर हम इसे सरकार की कमी ही मानते हैं तो फिर सरकार बदलो , पूरी सरकार का विरोध करो . धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़ा से क्या होगा । ये तो परीक्षा व्यवस्था पर रही बात आत्म हत्याएं जो हुई। ये समाज पर और समाज का कलंक है जो येन केन प्रकार से बच्चों को सफल बनाने की चाहत में अभिभावकों का साथ मिलता है । लाखों बच्चों की ज़िंदगी से खिलवाड़ कर दिया जाता है । आप अपने समय को भी देखिए। कौन सी परीक्षा थी जिसमें सीटें और सेंटर नहीबिकते थे। एक एक परीक्षा प्रकिया 5-5 वर्षों में पूरी होती थी। मेरा उद्देश्य सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार को बचाना नही बल्कि असली कारण की ओर ध्यान दिलाना है उसका असली कारण परिवार, समाज और छात्रों की आकांक्षाओं को मानता हूँ । मैं परेशानी और दुविधा को समझने के बाद भी लिख रहा हूँ आज हर परीक्षा में सामान्य और साधारण परिवार के बच्चों को बहुत अधिक सफलता मिल रही है ये क्या दर्शाता है, जरा सोचिए 22 लाख नीट परीक्षा को करवाने के लिए कम से कम हज़ारों लोगों की आवश्यकता होती है उन सब पर निगरानी रखने हेतु हज़ारों लोगों की मदद चाहिए । नैतिक मूल्यों का सम्मान करना चाहिए। एक और अंतिम उदाहरण समाज का हर व्यक्ति जानता है कि हत्या की सजा , रेप की सजा , डकैती की सजा , भ्रष्टाचार की सजा फिर भी रूक नहीं रहा, जरा सोचिए, समाज का क़ानून कमजोर हुआ है , नैतिकता गिरी है। न्यायपालिका निर्णय देती है जी न्याय नही, खैर। एक पहले का ज़माना था नैतिकता के आधार पर रेल एक्सीडेंट होने पर रेल मंत्री इस्तीफा दे देते थे, प्लेन क्रैश होने पर सिविल एविएशन मिनिस्टर इस्तीफा दे देते थे…
एक आज का समय है मुख्यमंत्री जेल जाने पर भी इस्तीफा नही देते, शिक्षा मंत्री बार बार पेपर लीक होने पर बच्चों के आत्महत्या पर इस्तीफा नही देते और करप्शन चार्ज लगने पर भी कोई आज इस्तीफा नही देता। दिल्ली मे धरना प्रदर्शन होना, उसमे उग्रता आना और अराजकता होना, किसानों का दिल्ली की तरफ कूच करना उनको शम्भू बॉर्डर पर रोकना…यह सब अचानक नही हो रहा है इन सब आंदोलनों के पीछे विदेशों से फंडिंग होती है, जैसे नेपाल में हुआ, बंगला देश मे हुआ, वही हमारे देश में किया जा रहा है, हमारे देश को भी अस्थिर करने की कोशिश हो रही है। हमे इस जाल में नही फसना है, कोई भी कदम उठाने से पहले कोई भी निर्णय लेने से पहले सोचे समझे की हमारा कदम कही हमारे देश के विरुद्ध तो नही है। भेड़ चाल से बचे। मतदान और सरकार का चुनाव अपने ही विवेक से और विचार से पहले से ही किया जाता है।
परिवार, समाज और नैतिकता की भूमिका से मैं असहमत नहीं हूँ। लेकिन जब किसी परीक्षा व्यवस्था में पेपर लीक, अनियमितता या भ्रष्टाचार की शिकायत सामने आती है, तो उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार और संबंधित संस्थाओं की ही बनती है। परिवार बच्चों पर दबाव डालता है, समाज भी अपेक्षाएँ रखता है—यह सही है। लेकिन अगर व्यवस्था निष्पक्ष और पारदर्शी हो, तो कम से कम बच्चों को यह भरोसा तो रहेगा कि उनकी मेहनत का परिणाम ईमानदारी से तय होगा। आत्महत्या के पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि परीक्षा व्यवस्था की विफलताओं और भ्रष्टाचार पर सवाल न उठाए जाएँ। दोनों मुद्दों को अलग-अलग देखते हुए भी गंभीरता से संबोधित करना जरूरी है। और अगर सरकार की नाकामी को ही समस्या का एक बड़ा कारण माना जा रहा है, तो फिर सरकार से जवाबदेही और सुधार की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी मंत्री का इस्तीफा अकेला समाधान नहीं हो सकता, लेकिन जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी है।
मेरा मानना है कि परिवार, समाज, छात्र और सरकार—सभी की अपनी-अपनी जिम्मेदारी है। किसी एक को पूरी तरह दोषी ठहराने के बजाय हमें उस पूरी व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है, जिसमें लाखों बच्चे अपने भविष्य के लिए मेहनत करते हैं। एक एक शब्द और परिस्थिति से सहमत पक्ष विपक्ष दोनो तरफ से राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम हो रहा है। हमारी सारी मांगे सरकार से ही है और सरकार ही दोषी है. सरकार को कड़े से कड़े निर्णय और नीति अपनाना होगा । परीक्षा रद्द करके सरकार ने कड़ा संदेश दिया है पर लोग आत्म हत्याएं पर आ गए। खैर। अब सवाल आप पूछ सकते हैं । शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा क्यों? “इतिहास सत्य पर आधारित हो, राजनीति पर नहीं।” शिक्षा मंत्री से इस्तीफ़े की मांग का वास्तविक कारण केवल पेपर लीक का मुद्दा नहीं है, बल्कि एनसीईआरटी (NCERT) के पाठ्यक्रम में संशोधन की वह पहल भी है, जिसके तहत छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान तथा विदेशी आक्रमणों का डटकर सामना करने वाले अनेक अन्य उपेक्षित वीरों के इतिहास और योगदान को उचित स्थान देने का प्रयास किया गया।
इतिहास का उद्देश्य तथ्यों को समग्रता से प्रस्तुत करना और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले सभी व्यक्तित्वों को निष्पक्ष रूप से सम्मान देना होना चाहिए। इसी कारण लंबे समय तक इतिहास लेखन पर प्रभाव रखने वाले वामपंथी बौद्धिक वर्ग और उससे जुड़े समूह स्वयं को असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि जो राजनीतिक और वैचारिक समूह अब तक लोकतांत्रिक तरीके से सरकार का प्रभावी मुकाबला नहीं कर पाए, वे अब विभिन्न मुद्दों पर एकजुट होकर वर्तमान सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, पश्चिम बंगाल के चुनावी अनुभव के बाद तथा पंजाब और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भी विभिन्न विपक्षी दलों और समूहों के बीच राजनीतिक समन्वय बढ़ने की बात कही जा रही है।
यदि शिक्षा और रोजगार का बड़ा गर्क करने वाले झूठे अमेरिका के चतुकर का विकल्प नहीं है ऐसा मानने की बात नहीं है यह नागपुर का एजेंडा है। हर वो व्यक्ति जो विकल्प पूछ रहा है वो स्वयं विकल्प है। दस सालों में विकल्प तेयार नहीं हुआ यह इस सरकार की सबसे बड़ी विफलता का प्रमाण है


