छात्र आंदोलन के कंधे पर सियासत का बोझ, 2 अक्टूबर ने खड़े किए तीन बड़े सवाल

रितेश सिन्हा

गांधी जयंती के दिन दिल्ली में हुआ 2 अक्टूबर का प्रदर्शन महज एक राजनीतिक विरोध नहीं था। यह छात्र राजनीति की स्वतंत्रता, राजनीतिक दलों की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही—तीनों पर गंभीर सवाल छोड़ गया। जंतर-मंतर के आसपास मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन हुआ। इसमें विभिन्न छात्र एवं युवा संगठनों के साथ राजनीतिक दलों से जुड़े नेता और कार्यकर्ता भी शामिल रहे। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और निषेधात्मक आदेश लागू किए गए थे। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर की ओर बढ़े और पुलिस ने 700 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया। इस पूरे घटनाक्रम को किसी एक पक्ष की नजर से देखना पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले सवाल छात्र आंदोलन की स्वतंत्रता का है। छात्र राजनीति लोकतंत्र की पाठशाला रही है। देश के अनेक आंदोलनों में युवाओं और छात्रों ने सत्ता से कठिन सवाल पूछे हैं। इसलिए छात्रों का राजनीतिक मुद्दों पर बोलना या प्रदर्शन करना लोकतंत्र के लिए अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन छात्र राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्रता है। यदि छात्र अपने मुद्दे स्वयं तय करते हैं, अपने नेतृत्व का चयन करते हैं और अपने तर्क के आधार पर आंदोलन चलाते हैं, तो उनकी आवाज की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता मजबूत होती है।

2 अक्टूबर का प्रदर्शन इसी कसौटी पर सवाल खड़ा करता है। आंदोलन का केंद्र शिक्षा, परीक्षा, फीस, छात्रवृत्ति या रोजगार जैसे विशुद्ध छात्र मुद्दे नहीं थे। मुख्य मांग मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की थी और एसआईआर तथा मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक विवाद इसके केंद्र में था। छात्रों को इन मुद्दों पर अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन जब किसी आंदोलन में राजनीतिक दलों के नेता और संगठन भी प्रत्यक्ष रूप से शामिल हों तो उसके राजनीतिक स्वरूप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहीं दूसरा सवाल राजनीतिक दलों की भूमिका का है। राजनीतिक दलों को निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है। वे एसआईआर पर आपत्ति कर सकते हैं, सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांग सकते हैं तथा जनता के बीच अपना पक्ष रख सकते हैं। लेकिन यदि राजनीतिक दल किसी आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं तो उन्हें उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए। छात्रों को आगे रखकर किसी व्यापक राजनीतिक संघर्ष को केवल छात्र आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करना पारदर्शी राजनीति नहीं माना जा सकता। युवा किसी राजनीतिक दल की भीड़ नहीं हैं। वे स्वतंत्र नागरिक हैं। उनके अपने राजनीतिक विचार हैं, अपने सवाल हैं और अपने भविष्य को लेकर अपनी चिंताएं हैं। राजनीतिक दलों को युवाओं की ऊर्जा की जरूरत है तो उन्हें उनके वास्तविक सवालों का जवाब भी देना होगा। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, भर्ती प्रक्रिया में देरी, शिक्षा की गुणवत्ता, फीस और भविष्य की सुरक्षा जैसे सवाल युवाओं के सामने हैं। यदि इन मुद्दों की जगह युवाओं को केवल बड़े राजनीतिक टकरावों में इस्तेमाल किया जाता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि छात्र हित कहां चला गया।

लेकिन यह कहना भी उचित नहीं होगा कि प्रदर्शन में शामिल हर छात्र किसी राजनीतिक दल का मोहरा था। ऐसा निष्कर्ष तथ्यों से सिद्ध नहीं होता। छात्र संगठनों की अपनी विचारधारा और राजनीतिक पहचान हो सकती है। वे राष्ट्रीय और संवैधानिक मुद्दों पर अपनी राय रख सकते हैं। इसलिए आलोचना का निशाना छात्रों की राजनीतिक चेतना नहीं, बल्कि छात्र राजनीति और दलगत राजनीति के बीच पारदर्शिता की कमी होनी चाहिए। तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण सवाल निर्वाचन आयोग तथा प्रशासन की जवाबदेही का है। एसआईआर और मतदाता सूची को लेकर प्रदर्शनकारियों तथा विपक्षी दलों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन इन दावों को स्वतः प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसके प्रमाण सामने आने चाहिए। यदि किसी नियम का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित नियम और उल्लंघन का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। बड़े पैमाने पर अनियमितता का दावा है तो उसके समर्थन में आंकड़े और दस्तावेज भी सामने आने चाहिए। यही कसौटी निर्वाचन आयोग पर भी लागू होती है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि प्रक्रिया नियमों के अनुसार है। मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी संरचना है। यदि उसके संबंध में व्यापक संदेह पैदा होता है तो निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि वह प्रक्रिया, दावों-आपत्तियों, नाम जोड़ने-हटाने और अंतिम सूची से जुड़े सवालों पर अधिकतम पारदर्शिता के साथ जानकारी दे। लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल संवैधानिक अधिकारों से नहीं, जनता के विश्वास से भी बनती है।

प्रशासन के सामने भी कठिन सवाल हैं। दिल्ली पुलिस ने कहा कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए निषेधात्मक आदेश लागू किए गए थे। यदि प्रदर्शनकारी प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़े तो पुलिस द्वारा उन्हें रोकना कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है। लेकिन 700 से अधिक लोगों की हिरासत जैसे बड़े कदम पर भी पारदर्शिता जरूरी है। किस आधार पर कितने लोगों को हिरासत में लिया गया, कितने लोगों पर कार्रवाई हुई और उन्हें कब छोड़ा गया—इन सबकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। प्रदर्शन के कारण दिल्ली मेट्रो के 12 स्टेशनों के प्रवेश और निकास अस्थायी रूप से बंद किए गए। बाद में इन्हें खोल दिया गया। यह घटना आंदोलनकारियों के लिए भी एक सबक है। विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन आम नागरिकों के आवागमन और सार्वजनिक व्यवस्था का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आंदोलन का उद्देश्य जनता की आवाज बनना है, जनता के लिए असुविधा का स्थायी कारण बनना नहीं। यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है। सरकार को असहमति सुननी होगी और आंदोलनकारियों को कानून की सीमा समझनी होगी। निर्वाचन आयोग को सवालों का जवाब देना होगा और प्रदर्शनकारियों को अपने आरोपों के प्रमाण देने होंगे। राजनीतिक दलों को युवाओं के बीच जाना होगा, लेकिन उनकी स्वतंत्रता का सम्मान भी करना होगा।

गांधी जयंती पर हुए इस प्रदर्शन का प्रतीकात्मक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। गांधी का संघर्ष सत्ता से सवाल पूछने का संघर्ष था, लेकिन उस संघर्ष की बुनियाद सत्य, अनुशासन और नैतिक जवाबदेही पर थी। आज के आंदोलनों के लिए भी यही कसौटी होनी चाहिए। सत्य केवल सत्ता से सवाल पूछने में नहीं, अपने दावों की भी कठोर जांच करने में है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है जब राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना बढ़ जाए कि हर पक्ष दूसरे को लोकतंत्र का विरोधी बताने लगे। निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हर आरोप को बिना प्रमाण स्वीकार करना लोकतांत्रिक बहस नहीं। सरकार की आलोचना जरूरी है, लेकिन सरकार की हर कार्रवाई को दमन कहना भी तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं। पुलिस की कार्रवाई की समीक्षा होनी चाहिए, लेकिन कानून की अवहेलना को स्वतः लोकतांत्रिक अधिकार घोषित नहीं किया जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक दलों की भूमिका सबसे अधिक पारदर्शी होनी चाहिए। यदि उन्हें निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति है तो वे अपने आरोपों और प्रमाणों के साथ खुलकर सामने आएं। यदि छात्र संगठन स्वतंत्र रूप से आंदोलन कर रहे हैं तो उन्हें भी अपनी स्वतंत्रता स्पष्ट रखनी चाहिए। छात्रों को राजनीतिक दलों की सीढ़ी नहीं, लोकतंत्र के स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए।

युवा शक्ति को राजनीति से दूर करना समाधान नहीं है। बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए युवाओं की राजनीतिक भागीदारी आवश्यक है। लेकिन युवाओं की ऊर्जा को केवल नारे, पोस्टर और भीड़ में बदल देना भी उनके साथ न्याय नहीं है। छात्र आंदोलन की असली शक्ति इस बात में है कि वह अपने मुद्दे खुद तय करे, तथ्य सामने रखे और किसी भी राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र रहकर सवाल पूछे। 2 अक्टूबर का प्रदर्शन इसलिए केवल पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की कहानी नहीं है। यह तीन अलग-अलग जिम्मेदारियों का सवाल है—छात्रों की अपनी आवाज बचाने की जिम्मेदारी, राजनीतिक दलों की पारदर्शिता की जिम्मेदारी और सरकार तथा निर्वाचन आयोग की जवाबदेही की जिम्मेदारी। लोकतंत्र में किसी भी संस्था को सवालों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। लेकिन सवाल पूछने वालों को भी प्रमाण और जिम्मेदारी से ऊपर नहीं रखा जा सकता। छात्रों की आवाज दबनी नहीं चाहिए, लेकिन छात्रों की आवाज को राजनीतिक हथियार भी नहीं बनाया जाना चाहिए। निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठें तो उनका जवाब तथ्यों से होना चाहिए। प्रशासन कानून लागू करे तो पारदर्शिता के साथ करे। और राजनीतिक दल युवाओं के साथ खड़े हों तो उन्हें युवाओं की स्वतंत्रता का भी सम्मान करना होगा।

यही 2 अक्टूबर के आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल है—क्या देश की युवा पीढ़ी अपने लोकतांत्रिक सवाल खुद तय करेगी, या उसके आक्रोश की दिशा राजनीतिक दल तय करेंगे? इस सवाल का जवाब सरकार, विपक्ष, निर्वाचन आयोग और छात्र संगठनों—सभी को देना होगा। लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं; वह सवाल पूछने, जवाब देने और दोनों पक्षों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की व्यवस्था है। छात्र आंदोलन तभी अपनी असली ताकत हासिल करेगा जब उसकी आवाज भी स्वतंत्र होगी और उसके तथ्य भी मजबूत होंगे।

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