डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

वह मेरे साथ टीचर ट्रेनिंग में भी और स्कूल में भी टीचर थी, लेकिन आज बहुत सालों बाद ज़िन्दगी ने हमें एक अनोखे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था। आज दोपहर का वक्त था जब मैं एक व्यस्त बस स्टैंड पर खड़ा था, आसमान पर घने बादलों का डेरा था और हवा में मिट्टी की वह सौंधी-सौंधी महक बसी थी जो रूह को तरोताज़ा कर देती है। सावन का महीना अपने साथ एक अलग ही मस्ती और उदासी लेकर आता है, और बारिश की हल्की फ़ुहारों ने इस माहौल में एक जादू सा घोल दिया था। इसी आलम में, अचानक एक स्कूटी आकर मेरे क़रीब रुकी। मैंने देखा, तो दिल में एक हल्की सी कसक हुई,जैसे इस चेहरे को कहीं देखा हो। उसके साथ एक ख़ूबसूरत दोषिजा शायद उसकी फ्रेंड होगी,भी थी, फिर अचानक याद की धुंध छटी और दिल ने कहा, अरे यह तो संजीदा है!
मैं बिना सोचे-समझे उसके करीब पहुँच गया और बेबाकी से बोला, “आपने मुझे पहचाना?” वह बोली, “नहीं…” मैंने कहा, “मैं वक़ार! अरे हाँ…”वह थोड़ी देर के लिए गहरी सोच में डूब गई, फिर अचानक उसके चेहरे पर एक जानी-पहचानी मुस्कराहट उभर आई, जिसकी चमक ने बारिश की इस उदासी को भी मानंद कर दिया था। “अरे वक़ार! सच्ची में, इतने सालों बाद… तुम बिल्कुल नहीं बदले, बस थोड़े से संजीदा लग रहे हो,” उसने खुशी से कहते हुए स्कूटी का हैंडल संभाला।

दूसरी लड़की जो उसके साथ थी, उसने जिज्ञासा से हमें देखा। संजीदा ने फौरन हमारा परिचय करवाया, “यह वक़ार हैं, ट्रेनिंग के दिनों के हमारे बहुत अच्छे दोस्त… और यह हाजरा हैं, हमारी नई साथी टीचर।” हमने एक-दूसरे को सलाम किया और फिर बातों का सिलसिला वहीं बस स्टैंड पर चल निकला। गुज़रे हुए कल की वह यादें जो धुंधला चुकी थीं, एक बार फिर ताज़ा हो गईं। वक्त कितनी तेज़ी से गुजर जाता है, लेकिन कुछ रिश्ते और चेहरे वक्त की गर्द के नीचे भी वैसे के वैसे सुरक्षित रहते हैं। कुछ देर हम पुराने साथियों के तज़किरे करते रहे, कौन कहाँ है, किसकी शादी हो गई और कौन सा दोस्त अब किस शहर में पढ़ा रहा है। बातों ही बातों में मालूम हुआ कि वे दोनों भी बस का ही इंतज़ार कर रही थीं क्योंकि स्कूल की वैन खराब हो गई थी। बातों-बातों में यादों की वह परतें खुलती चली गईं जो बरसों से दिल के किसी छिपे हुए कोने में बंद थीं। मैंने ज़रा सा झुक कर उसकी आँखों में देखा और धीमी आवाज़ में कहा: “संजिदा! तुम्हें याद है वह दिन… जब चारों तरफ़ मूसलाधार बारिश हो रही थी और नदी में पानी का बहाव इतना तेज़ था कि उसकी लहरें उत्तेजना में बज़ाहिर सब कुछ बहा ले जाने पर तुली थीं? पानी लगातार बढ़ रहा था, और नदी पार करके स्कूल जाना किसी ख़तरे से ख़ाली नहीं था। एक दिन तुम नदी के उस पार खड़ी थीं और तुम्हें इस ख़तरनाक बहाव को चीर कर इस पार आना था, याद आया वह मंज़ेर?”

मैंने सांस रोकी और बीते हुए वक्त के उस हसीन फ्रेम को अल्फाज़ में उतारते हुए आगे कहा: “जब मैंने तुम्हें उस पार अकेले खड़े देखा, तो मेरे कदम खुद-ब-खुद तुम्हारी तरफ़ उठ गए। बारिश की इन तेज़ धारों में भी तुम इतनी हसीन लग रही थी कि क़ायनात का सारा शोर थम सा गया था। तुमने घबरा कर मेरी तरफ़ देखा और डरते हुए कहा था, ‘वक़ार! मुझे यह नदी पार करवा दीजिए।’ वहाँ आस-पास कुछ बच्चेऔर लोग भी मौजूद थे, लेकिन उनके होने या न होने से मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था।” मेरा लहज़ा अब और ज़्यादा धीमा और दर्द में डूबा हुआ था, “फ़िर जब मैंने पहली बार तुम्हारा वह नर्म नाज़ुक हाथ अपने हाथ में लिया… तो यक़ीन करो, मेरे पूरे वज़ूद में एक बिजली सी दौड़ गई थी। उस उम्र का वह पहला तकाज़ा, जवानी की वह पहली कच्ची तपिश, और दिल की गहराइयों में प्रेम की पहली क़सक और एहसास ने मेरे होश उड़ा दिए थे। कैसे बयान करूँ उस कैफ़ियत को! शायद मेरा वह पहला स्पर्श सिर्फ़ मेरे हाथ का नहीं था, बल्कि मेरे अंदर की बेक़रारी का वह तूफ़ान था जो तुम्हें भी अंदर तक पिघला रहा था… बोलो, क्या तुम्हें याद नहीं?” उसने पलकें उठाईं, कुछ देर तक मेरी आँखों में गहराई से झांकती रही। उसकी पलकों पर बारिश के क़तरों के साथ-साथ यादों की नमी भी चमक रही थी। उसने एक हल्की सी आह भरी, उसके होंठ काँपे, और वह बोली,
“कुछ पल ऐसे होते हैं वक़ार, जो वक्त की इस तूफ़ानी नदी में कभी नहीं बहते… तुमने तो बज़ाहिर उस दिन सिर्फ़ मेरा हाथ पकड़ कर मुझे नदी पार करवाई थी, लेकिन…” वह रुक गई, उसके गले में आवाज़ जैसे अटक गई थी, “…लेकिन उस एक लम्हे ने मेरे अंदर जो तूफ़ान पैदा किया था,, वह तूफ़ान जो तुम्हारे उस पहले लम्स से उठा था, उसे तो मैं आज तक पार नहीं कर सकी!” उसकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान फ़ैल गई, और उसने अपनी पलकें झुकाते हुए छेड़ते हुए कहा, “तुम्हारी वह बेक़रारी… जब तुम मुझसे मिलने के जाने-पहचाने और अजीब-गरीब बहाने ढूँढा करते थे!” पास ही खड़ी उसकी सहेली, जो अब तक बड़ी ख़ामोशी और दिलचस्पी से हम दोनों की बातें सुन रही थी, मंद-मंद मुस्कुरा उठी। उसने चुटकी लेते हुए कहा। “अच्छा! तो माज़रा यह था… और हम सब नासमझ यह समझते थे कि वक़ार सर सिर्फ़ पढ़ाई और ट्रेनिंग के सिलसिले में ही हमारे स्कूल के इतने चक्कर लगाया करते थे!” यह सुनते ही संजीदा का चेहरा शर्म से लाल हो गया और उसने झेंपते हुए अपनी नज़रें झुका लीं,मैंने उसकी तरफ़ प्यार भरी नज़रों से देखा, दिल की धड़कन को थोड़ा संभाला और मुस्कुराते हुए कहा, “वो बहाने भले ही नादान से लगते हों संजीदा, पर वो झूठे बिल्कुल नहीं थे… वो तो बस दिल की उस अनकही सच्चाई को बयां करने के चंद सादे और मजबूर तरीक़े थे, जिन्हें मैं चाहकर भी छुपा नहीं पाता था।”इतने में संजीदा की सहेली को किसी ज़रूरी काम से जाना पड़ा, तो वह चली गई। बस का अब तक कोई पता नहीं था, तो मैंने झिझकते हुए कहा, “अगर तुम मुनासिब समझो… तो चूँकि मैं अकेला हूँ, मैं तुम्हें अपनी स्कूटी पर छोड़ दूँ?” उसने हल्का सा मुस्कुराकर सर हिला दिया।
जब हम स्कूटी पर साथ रवाना हुए तो रास्ते का वह सफ़र किसी हसीन ख़्वाब की तरह महसूस होने लगा। आसमान पर बादल अब भी छाए हुए थे और सड़क पर हल्की-हल्की फ़ुहारें गिर रही थी। संजीदा स्कूटी पर पीछे बैठी थी, और रास्ते के इस सर्द व हसीन सफ़र में जब झटके लगे या हवा तेज़ हुई, तो उसने अपने आपको संभालने के लिए हल्का सा मेरा कुर्ता पकड़ लिया। उसके नाज़ुक हाथों का वह हल्का सा लम्स मेरे कुर्ते के ज़रिए मेरे दिल तक उतर गया, और दिल की धड़कनें एक बार फिर बेक़ाबू हो गईं।
अभी हम कुछ ही दूर गए थे कि बारिश ने एक बार फ़िर ज़ोर पकड़ लिया, और आसमान से मोटे-मोटे क़तरे झम-झम बरसने लगे। संजीदा ने घबरा कर कहा, “वक़ार! बारिश बहुत तेज़ हो गई है, ऐसे में आगे जाना मुश्किल है, कहीं पनाह लेनी होगी!” मैंने बिना एक लम्हा गंवाए स्कूटी सड़क के किनारे बने एक पुराने, घने बरगद के पेड़ के नीचे रोक दी। चारों तरफ़ पानी की छमाछम आवाज़ थी और बरसात का यह ज़ोरदार रिमझिम मंज़र ऐसा था जैसे वक्त ने खुद हमें इस लम्हे में क़ैद कर लिया हो।
हम दोनों उस पेड़ की घनी छाँव में खड़े थे। बारिश की फ़ुहारें अब भी हल्की-हल्की हम तक पहुँच रही थीं जिससे हमारे कपड़े भीगे हुए थे। मैंने अपने कुर्ते की आस्तीन से अपने चेहरे का पानी साफ किया और उसके करीब होकर बोला, “तुम्हें याद है, पुरानी ट्रेनिंग के दिनों में भी एक बार हम ऐसे ही बारिश में फंस गए थे?” संजीदा ने मेरी आँखों में देखा, उसकी निगाहों में वही बरसों पुरानी चाहत और अपनापन था, उसने अपना भीगा हुआ हाथ आगे बढ़ाया और मेरे हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, “कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलीं वक़ार… जैसे यह बारिश, और जैसे मेरे दिल में तुम्हारे लिए वह पहली जैसी धड़कन।” फिर मैंने पूछा, “कहाँ है तुम्हारा घर? क्या वहीं छोड़ दूँ?” उसने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, बस सामने वाली गली में ही है।” मैंने उसके बताए हुए रास्ते पर स्कूटी बढ़ाई और एक ख़ूबसूरत से मकान के सामने जाकर बाइक रोक दी। वह स्कूटी से उतरी और बोली, “अंदर आकर चाय पिए बिना तो जाने नहीं दूंगी।” घर के अंदर दाख़िल होते हुए मैंने पूछा, “तुम यहाँ अकेली रहती हो?” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “हाँ… बस अब अकेली ही रहती हूँ।”
कुछ ही देर में वह चाय की प्यालियाँ लेकर आई। हम दोनों आमने-सामने बैठ गए। चाय की चुस्की लेते हुए मैंने कहा, “अब इस अकेलेपन में दिन कैसे गुजरते हैं?” उसने एक हल्की सी मुस्कराहट के साथ कहा, “अब तक तो अकेले ही कट रहे थे… लेकिन शायद आज से दिन गुज़रने के बहाने थम जाएंगे।” जब मैंने जाने के लिए विदा लेनी चाही और कहा, “अब मुझे इजाज़त दो, देर हो रही है…” तो उसकी आँखों में उदासी की लहर दौड़ गई। उसने कहा देर तो,,, हां,,, देर तो बहुत हो गई,पहले ही। लेकिन,,,उसने मेरी तरफ़ एक हसरत भरी निगाह से देखा और जैसे ही मैंने क़दम बढ़ाए, उसने मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी शिद्दत और बेबसी थी, “रुक जाइए… वक़ार, क्या यह ख़ामोशी इस चंद मिनट की मुलाक़ात पर भारी नहीं पड़ जाएगी? मत जाइए… आज इस बारिश को हमारा फ़ैसला करने दीजिए।”
उसकी काँपती उंगलियों की जकड़ और आँखों में उमड़ते समंदर ने मेरे पाँव ज़मीन में जैसे धंसा दिए। मैंने गहरी साँस ली, उसके हाथों पर अपना हाथ रखा और मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा, “अब जब इस बारिश ने और तुम्हारे इन हाथों ने मुझे रोक ही लिया है संजीदा, तो समझो कि मेरे सारे रास्ते यहीं आकर ख़त्म हो गए हैं। अब न कोई जुदाई होगी, और न ही कोई अधूरापन।”
बरसों की दूरियाँ और अनकहे फ़ासले उस एक लम्हे में पिघलकर बह गए। बाहर रिमझिम बारिश अभी भी बरस रही थी, पर अब वह उदासी की बारिश नहीं थी… बल्कि हमारे टूटे हुए सफ़र को मुकम्मल करती हुई, एक नई और हमेशा-हमेशा की ख़ूबसूरत सुबह की पहली बूँद थी।



