मुठभेड़ों की सुर्खियों के पीछे छिपती नाकामियाँ और हर मुख्यमंत्री से उठते सवाल?- रितेश सिन्हा

अगर इस देश में अपराध का फैसला अदालत नहीं, पुलिस की गोली करने लगे, तो मुख्यमंत्रियों को साफ-साफ कह देना चाहिए कि उन्हें कानून का राज नहीं, मुठभेड़ राज चाहिए। बिहार के भरत तिवारी की मौत ने यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया है। एक युवक मारा जाता है, पुलिस उसे मुठभेड़ बताती है, परिवार और स्थानीय लोग पुलिस के कथन पर सवाल उठाते हैं, सरकार पहले “सख्त शासन” का चेहरा चमकाती है और फिर जांच की ओट में चली जाती है। यही आज की राजनीति का सबसे आसान नुस्खा बनता दिख रहा है—जब भ्रष्टाचार पर जवाब न हो, घोटालों पर सफाई न हो, बेरोज़गारी का हल न हो, अस्पताल-स्कूल बदहाल हों, सड़क-पानी-बिजली की हालत पर सरकार घिर रही हो, तब एक मुठभेड़ सबसे आसान हेडलाइन बन जाती है। यानी काम कम, गोली की खबर ज्यादा; शासन कम, सख्ती का प्रचार ज्यादा।

भोजपुर के भरत तिवारी प्रकरण ने बिहार सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। पुलिस ने इसे मुठभेड़ बताया, लेकिन परिवार का आरोप है कि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था, फिर भी गोली मारी गई। मामला इतना बढ़ा कि बिहार सरकार को न्यायिक जांच बैठानी पड़ी और सर्वोच्च न्यायालय में स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका तक पहुँच गई। यही अपने आप में बताता है कि मामला साधारण पुलिस कार्रवाई भर नहीं माना जा रहा। अगर सब कुछ कानून के मुताबिक था, तो न्यायिक जांच की जरूरत क्यों पड़ी? अगर पुलिस का कथन इतना ही निर्विवाद था, तो सरकार को अलग से निष्पक्ष जांच का भरोसा क्यों दिलाना पड़ा? बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने यही सबसे बड़ा सवाल है। न्यायिक जांच का फैसला और बढ़ते राजनीतिक दबाव ने इस मामले को केवल कानून-व्यवस्था नहीं, सरकार की जवाबदेही का मुद्दा बना दिया है।
यह सिर्फ बिहार की कहानी नहीं है। यह उस राजनीति का आईना है जिसमें अपराध से लड़ने का असली काम पीछे और “कठोर सरकार” का प्रचार आगे हो गया है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के 2024 के आँकड़े बताते हैं कि देश में 58.85 लाख संज्ञेय अपराध दर्ज हुए, हत्या के 27,049 मामले सामने आए और साइबर अपराध 1,01,928 तक पहुँच गए। यानी अपराध का संकट खत्म नहीं हुआ, उसका चेहरा और फैला है। लेकिन क्या राज्य सरकारें फोरेंसिक, पुलिस विवेचना, अभियोजन, अदालतों की क्षमता, गवाह सुरक्षा और साइबर ढाँचे को मजबूत करने पर उतना शोर मचाती हैं? नहीं। वह कठिन काम है। आसान काम है—1 मुठभेड़, 10 बयान, 20 पोस्टर और 100 सुर्खियाँ।
सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सवाल बनता है, क्योंकि “एनकाउंटर मॉडल” को शासन की उपलब्धि की तरह सबसे आक्रामक ढंग से वहीं बेचा गया। अगर इतने वर्षों की “सख्ती” के बाद भी रोजगार, भर्ती, महिला सुरक्षा, स्थानीय पुलिसिंग और अदालतों पर भरोसे के सवाल जस के तस हैं, तो यह मॉडल कानून से ज्यादा राजनीति का मॉडल दिखता है। योगी आदित्यनाथ को बताना चाहिए कि उन्हें अपराध कम करना था या “डर वाली सरकार” का विज्ञापन बनाना था।
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर सवाल इसलिए और सीधा है, क्योंकि भरत तिवारी का मामला किसी स्थापित गिरोहबाज का नहीं, बल्कि एक ऐसे युवक की मौत का मामला बन गया है जिसमें आत्मसमर्पण, पुलिस कार्रवाई, प्राथमिकी और न्यायिक जांच—सब एक साथ खड़े हैं। बिहार में बाढ़, कटाव, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और स्थानीय प्रशासन की विफलता जैसे सवाल पुराने हैं। सम्राट चौधरी को बताना होगा कि बिहार में शासन का मतलब न्याय है या सिर्फ 48 घंटे वाली धमक। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी इस सवाल से नहीं बच सकते। जब राज्य के पुलिस प्रमुख पाँच महीनों में करीब 70 मुठभेड़ों की बात करें, तो यह उपलब्धि से ज्यादा बेचैनी पैदा करती है। हरियाणा में बेरोज़गारी, भर्ती विवाद, पेपर लीक, किसानों की नाराज़गी, नशे का फैलाव और महिला सुरक्षा जैसे सवाल कम नहीं हैं। नायब सैनी को बताना चाहिए कि उनकी सरकार कानून मजबूत कर रही है या सिर्फ कठोरता का पोस्टर चिपका रही है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भी जवाब देना होगा। उद्योग और निवेश की चमक के पीछे किसानों की बदहाली, शहरी अव्यवस्था, मादक पदार्थों के नेटवर्क, वसूली, बिल्डर-राज और स्थानीय भ्रष्टाचार की शिकायतें लगातार बनी रहती हैं। फडणवीस को बताना चाहिए कि क्या हर विवादित पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच होती है, हर गोली का हिसाब है, और क्या सरकार किसानों, युवाओं और शहरों की बुनियादी समस्याओं पर उतनी ही सख्ती दिखाती है, जितनी कैमरों के सामने अपराध पर दिखाती है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीति भी “कड़ी कार्रवाई” की भाषा पर टिकी दिखती है। लेकिन असम में बेरोज़गारी, बाढ़, विस्थापन, नागरिकता विवाद, सामाजिक तनाव और प्रशासनिक पक्षपात जैसे मुद्दे क्या खत्म हो गए? अगर नहीं, तो क्या राज्य की हर बेचैनी का इलाज पुलिस की सख्ती है? हिमंत सरमा को बताना चाहिए कि वे कानून का राज चला रहे हैं या कठोर छवि का कारोबार।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से पूछा जाना चाहिए कि उनकी सरकार के पास अपराध से लड़ने का रोडमैप क्या है—फोरेंसिक, अभियोजन, पुलिस सुधार और अदालतों की क्षमता बढ़ाना, या फिर मंच से सख्त बयान देना? भर्ती गड़बड़ियाँ, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य ढाँचे की कमजोरी और महिलाओं के खिलाफ अपराध के सवालों के बीच अगर सबसे ऊँची आवाज़ “सख्ती” की है, तो यह शासन से ज्यादा छवि-प्रबंधन लगता है। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से भी पूछा जाना चाहिए कि क्या राज्य की राजनीति अब काम से ज्यादा सुर्खी पर चल रही है। राजस्थान में बेरोज़गारी, पेपर लीक, पानी का संकट, सीमावर्ती चुनौतियाँ, गैंगवार और खनन माफिया जैसे मुद्दे कम नहीं हैं। भजनलाल शर्मा को बताना चाहिए कि वे कानून-व्यवस्था सुधार रहे हैं या सिर्फ अख़बार की हेडलाइन तलाश रहे हैं।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से भी सवाल बनता है। बड़े वादे और शहरी चमक अपनी जगह, लेकिन अगर किसान, बेरोज़गार, ग्रामीण ढाँचा और बुनियादी सेवाएँ पीछे छूटती जाएँ और सुर्खी पुलिस कार्रवाई ले जाए, तो यह अच्छी सरकार का नहीं, बेचैन सरकार का संकेत है। रेवंत रेड्डी को बताना चाहिए कि उनकी राजनीति विकास की है या दृश्य-प्रबंधन की। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से भी जवाब चाहिए। खनन, भ्रष्टाचार, आदिवासी इलाकों की बदहाली, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था के सवाल झारखंड में पुराने हैं। अगर इन सवालों का जवाब शासन नहीं दे पा रहा और “कठोर कार्रवाई” का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है, तो यह संदेह और गहरा होता है कि सरकार काम से ज्यादा कहानी गढ़ रही है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पर भी उतना ही बड़ा सवाल है। नक्सल चुनौती, आदिवासी अधिकार, दूरदराज़ इलाकों की बदहाल सेवाएँ, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी समस्याएँ आज भी सामने हैं। अगर इन सबके बीच गोली की खबरें शासन का चेहरा बनें, तो यह पूछना ही होगा कि क्या सरकार समाधान दे रही है या सिर्फ शक्ति का प्रदर्शन कर रही है।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से भी सीधा सवाल है। नशा, गैंगस्टर, बेरोज़गारी, वित्तीय संकट, खेती की बेचैनी और प्रशासनिक अस्थिरता—पंजाब के सामने चुनौतियाँ कम नहीं हैं। अगर इन सवालों के बीच “सख्त कार्रवाई” की सुर्खियाँ असली समस्याओं को ढकने लगें, तो यह माना जाएगा कि सरकार इलाज नहीं, इश्तिहार कर रही है। दिल्ली भले सीधे किसी मुख्यमंत्री की पुलिस के अधीन न हो, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी की कानून-व्यवस्था पर अंतिम राजनीतिक जवाबदेही केंद्र और गृह मंत्रालय से भी माँगी जानी चाहिए। अगर राज्यों में मुठभेड़ों की राजनीति फैल रही है, अगर “कठोरता” को शासन का विकल्प बनाया जा रहा है, अगर न्यायिक प्रक्रिया से पहले पुलिस कार्रवाई की वाहवाही हो रही है, तो क्या केंद्र सिर्फ तमाशबीन बना रहेगा? मुठभेड़ अब कानून-व्यवस्था का आखिरी उपाय नहीं, राजनीतिक औजार बनती जा रही है। अदालतों को मजबूत करना कठिन है। पुलिस जांच सुधारना कठिन है। फोरेंसिक ढाँचा बनाना कठिन है। गवाह सुरक्षा लागू करना कठिन है। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना कठिन है। भर्ती घोटाले रोकना कठिन है। सरकारी अस्पतालों को ठीक करना कठिन है। स्कूलों की हालत सुधारना कठिन है। बेरोज़गारी कम करना कठिन है। लेकिन “हम अपराधियों को ठोक देंगे” कहना बहुत आसान है। “हम डर पैदा कर देंगे” कहना आसान है। “हमने इतने एनकाउंटर किए” कहना आसान है। यही आसान राजनीति सबसे खतरनाक है, क्योंकि इसमें शासन गायब हो जाता है और हेडलाइन बची रह जाती है।
भरत तिवारी का मामला सिर्फ एक मौत की कहानी नहीं है, यह उस पूरे राजनीतिक खेल की पोल खोलता है जिसमें मुख्यमंत्री काम से ज्यादा कठोरता की ब्रांडिंग बेचते हैं। जिस राज्य में भर्ती अटकी हो, अस्पताल टूटे हों, स्कूल खाली हों, किसान कर्ज में हो, युवा बेरोज़गार घूम रहा हो, शहर जाम से और गाँव प्यास से जूझ रहे हों—वहाँ अगर सरकार की सबसे ऊँची आवाज़ “एनकाउंटर” बन जाए, तो समझ लीजिए कि शासन जनता से नहीं, कैमरे से संवाद कर रहा है। यह कानून-व्यवस्था की बहस भर नहीं, लोकतंत्र की दिशा का सवाल है।
सवाल सिर्फ राज्यों तक सीमित नहीं है। केंद्र को तय करना होगा कि वह संविधान का पहरेदार है या “एनकाउंटर संस्कृति” का मौन संरक्षक। अगर हर राज्य में पुलिस की गोली शासन की भाषा बनती गई, अगर हर विवादित मौत के बाद पहले प्रचार और बाद में जांच का क्रम चलता रहा, अगर अदालतों की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस और सुर्खियाँ न्याय का विकल्प बनने लगीं, तो यह केवल राज्यों की विफलता नहीं होगी—यह पूरे गणराज्य की नैतिक हार होगी। तब भरत तिवारी आखिरी नाम नहीं होगा। तब हर राज्य में कोई नया “भरत” होगा, हर सरकार अपनी सख्ती का ढोल पीटेगी, हर परिवार न्याय की भीख माँगेगा और हर बार सत्ता यही कहेगी—सब कुछ कानून के मुताबिक हुआ। सबसे बड़ा सवाल यही है—भारत में और कितने “भरत” ऐसे निबटेंगे?
