संसद के मानसून सत्र के बीच प्रधानमंत्री की सचिवों संग बैठक ने खड़े किए नौकरशाही पर बड़े सवाल

विकसित भारत की राह में सबसे बड़ी बाधा कौन?- रितेश सिन्हा

संसद का मानसून सत्र जारी है। देश एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा की संवेदनशील चुनौतियों का सामना कर रहा है तो दूसरी ओर 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और विकसित भारत-2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ने का दावा कर रहा है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के सचिवों की उच्चस्तरीय बैठक बुलाकर राष्ट्रीय तैयारियों, मंत्रालयों के बीच समन्वय, प्रशासनिक क्षमता तथा संकट की स्थिति में त्वरित निर्णय व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की। प्रधानमंत्री ने सचिवों को निर्देश दिया कि प्रत्येक मंत्रालय अपनी कार्यप्रणाली का समग्र परीक्षण करे, आवश्यक सेवाओं की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करे, आंतरिक संवाद व्यवस्था को मजबूत बनाए, आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने की तैयारी को परखे तथा राज्यों के साथ निरंतर समन्वय बनाए रखे। भ्रामक सूचनाओं पर नियंत्रण और महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना की सुरक्षा पर भी विशेष बल दिया गया।

सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार की बैठक केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया मानी जाती। किंतु संसद के मानसून सत्र के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा सभी मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारियों को एक साथ बुलाकर इस प्रकार की समीक्षा करना अनेक गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। यदि मंत्रालयों के बीच समन्वय पहले से ही पूरी तरह प्रभावी होता, यदि निर्णय प्रक्रिया समयबद्ध होती और यदि प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षित गति से कार्य कर रही होती, तो क्या इतनी व्यापक समीक्षा और इतने स्पष्ट निर्देशों की आवश्यकता पड़ती? यह प्रश्न किसी एक अधिकारी या किसी एक मंत्रालय का नहीं है। यह उस प्रशासनिक कार्य-संस्कृति का प्रश्न है जो दशकों से भारतीय शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति भी रही है और सबसे बड़ी चुनौती भी। आज जब पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण, हरित ऊर्जा, डिजिटल शासन और तीव्र निर्णय क्षमता की दिशा में आगे बढ़ रही है, तब भारत की सबसे बड़ी परीक्षा केवल नई योजनाएँ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें समय पर पूरा करना है।

प्रधानमंत्री स्वयं पिछले कई वर्षों से “प्रगति” मंच के माध्यम से लंबित परियोजनाओं की नियमित समीक्षा करते रहे हैं। इस मंच का उद्देश्य ही विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करना और वर्षों से लंबित परियोजनाओं को गति देना है। यदि प्रशासनिक व्यवस्था स्वाभाविक रूप से परिणामोन्मुख होती, तो प्रधानमंत्री को बार-बार इस प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता शायद नहीं पड़ती। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गतिशक्ति राष्ट्रीय महायोजना इसलिए प्रारम्भ की क्योंकि परियोजनाओं में विभागीय समन्वय की कमी, अलग-अलग मंत्रालयों की स्वीकृतियों में देरी तथा योजनाओं के धीमे क्रियान्वयन को राष्ट्रीय विकास में बाधा माना गया। सरकारी आँकड़ों के अनुसार इस व्यवस्था के अंतर्गत अब तक 352 बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं, जिनकी अनुमानित लागत 16.10 लाख करोड़ रुपये है, का परीक्षण किया जा चुका है। इनमें 201 परियोजनाओं को स्वीकृति दी जा चुकी है और 167 परियोजनाएँ क्रियान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। यह आँकड़ा केवल सरकार की सक्रियता नहीं दर्शाता, बल्कि यह भी बताता है कि इतनी बड़ी संख्या में परियोजनाओं के लिए शीर्ष स्तर पर समन्वित निगरानी की आवश्यकता महसूस हुई।

इसी प्रकार परियोजना निगरानी समूह की स्थापना भी सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था पर एक प्रकार की टिप्पणी है। 500 करोड़ रुपये या उससे अधिक लागत वाली परियोजनाओं में मंत्रालयों, विभागों और राज्यों के बीच आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई। आज लाखों करोड़ रुपये की परियोजनियाँ इसकी निगरानी में हैं। यदि नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया समयबद्ध और प्रभावी होती, तो अलग से ऐसी प्रणाली बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ती? प्रधानमंत्री की 49वीं प्रगति बैठक में अकेले 15 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से जुड़ी 65,000 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली 8 महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं की समीक्षा की गई। उसी बैठक में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी परियोजना में देरी की दोहरी कीमत चुकानी पड़ती है, एक ओर उसकी लागत बढ़ती है, दूसरी ओर जनता समय पर सुविधा से वंचित रह जाती है। यह टिप्पणी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक स्पष्ट संदेश थी। सवाल यह है कि यदि प्रधानमंत्री को बार-बार स्वयं परियोजनाओं की समीक्षा करनी पड़ रही है तो क्या संबंधित मंत्रालयों और विभागों की जवाबदेही पर्याप्त रूप से तय हो पा रही है?

देश में अनेक ऐसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएँ हैं, जिनमें समयसीमा बार-बार बदली गई। भारतमाला परियोजना के अनेक चरण भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृतियों, ठेका प्रक्रियाओं तथा विभागीय समन्वय की चुनौतियों के कारण निर्धारित समय से पीछे चले। बाद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी इस परियोजना के विभिन्न पहलुओं पर टिप्पणियाँ दर्ज कीं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल योजना की घोषणा पर्याप्त नहीं होती; उसका समयबद्ध क्रियान्वयन ही वास्तविक सफलता का पैमाना है। मुंबई-अहमदाबाद उच्च गति रेल परियोजना, जिसे देश की सबसे प्रतिष्ठित आधारभूत संरचना परियोजनाओं में गिना जाता है, अपनी मूल समयसीमा से पीछे चली गई। सरकारी निगरानी रिपोर्टों के अनुसार इसकी प्रारंभिक समयसीमा दिसंबर 2023 थी, जिसे आगे बढ़ाकर अगस्त 2027 तक करना पड़ा। लगभग 44 महीने का विलंब यह बताता है कि बड़े राष्ट्रीय अभियानों में प्रशासनिक, तकनीकी और समन्वय संबंधी चुनौतियाँ कितनी जटिल हो सकती हैं।

समर्पित मालवाहक गलियारा, अनेक सिंचाई परियोजनाएँ, जलापूर्ति योजनाएँ तथा शहरी विकास से जुड़ी अनेक परियोजनाएँ विलंब का सामना करती रही हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय नियमित रूप से 150 करोड़ रुपये या उससे अधिक लागत वाली केंद्रीय परियोजनाओं की निगरानी करता है। यह व्यवस्था स्वयं इस बात का प्रमाण है कि समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करना आज भी भारतीय प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। सूचना के अधिकार के अंतर्गत सार्वजनिक हुई जानकारी ने प्रशासनिक प्रशिक्षण व्यवस्था पर भी चर्चा को जन्म दिया। उपलब्ध सूचना के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में 24 भारतीय प्रशासनिक सेवा के प्रशिक्षु अधिकारी एक या अधिक प्रशिक्षण परीक्षाओं में असफल हुए। यह तथ्य किसी अधिकारी की अंतिम योग्यता का प्रमाण नहीं है, क्योंकि पुनर्परीक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था उपलब्ध है। फिर भी यह संकेत अवश्य देता है कि देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं में भी निरंतर प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और कार्यकुशलता की समीक्षा उतनी ही आवश्यक है जितनी किसी अन्य क्षेत्र में।

देश में आज भी अनेक उद्यमी, उद्योगपति और निवेशक एक जैसी शिकायत करते हैं—परियोजना का विचार तैयार होने के बाद सबसे अधिक समय अनुमति, अनापत्ति, विभागीय स्वीकृतियों और फाइलों की आवाजाही में व्यतीत होता है। एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय और फिर राज्य तथा केंद्र के बीच समन्वय का अभाव कई बार वर्षों की देरी का कारण बन जाता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान केवल उद्योग को नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी होता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय वर्षों से 150 करोड़ रुपये या उससे अधिक लागत वाली केंद्रीय परियोजनाओं की नियमित निगरानी करता है।परियोजनाओं की प्रगति पर मासिक प्रतिवेदन जारी किए जाते हैं। इसका उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि लागत वृद्धि, समयसीमा में विस्तार और प्रशासनिक विलंब पर समय रहते नियंत्रण पाया जा सके। यदि नियमित प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह सक्षम होती, तो इतनी विस्तृत निगरानी प्रणाली की आवश्यकता कम पड़ती।

प्रधानमंत्री मोदी ने अनेक अवसरों पर कहा है कि परियोजनाओं में देरी का अर्थ केवल समय का नुकसान नहीं, बल्कि जनता के धन का नुकसान भी है। समय बढ़ता है तो लागत बढ़ती है, लागत बढ़ती है तो सार्वजनिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और नागरिकों को मिलने वाली सुविधाएँ भी देर से पहुँचती हैं। यह स्थिति केवल सड़कों या रेल परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। जल जीवन मिशन, शहरी पुनरुद्धार योजनाएँ, सिंचाई परियोजनाएँ, औद्योगिक गलियारे, बंदरगाह संपर्क परियोजनाएँ और अनेक राज्य स्तरीय आधारभूत संरचना योजनाएँ भी समय-समय पर विभागीय समन्वय, भूमि अधिग्रहण, स्वीकृतियों तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण प्रभावित होती रही हैं। इन चुनौतियों का उल्लेख विभिन्न सरकारी समीक्षाओं और संसदीय चर्चाओं में भी होता रहा है।

प्रधानमंत्री द्वारा संसद के मानसून सत्र के बीच सचिवों की बैठक बुलाना इस दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह संकेत है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक तत्परता को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देना चाहती है। यदि शीर्ष स्तर पर बार-बार समन्वय, त्वरित निर्णय, आपातकालीन तैयारी और उत्तरदायित्व पर बल देना पड़ रहा है, तो यह स्वाभाविक है कि देश प्रशासनिक कार्यसंस्कृति पर गंभीर विमर्श करे।

प्रशासनिक शिथिलता पूरे तंत्र की छवि को प्रभावित करती है। अब समय आ गया है कि प्रशासनिक सेवाओं में परिणाम आधारित मूल्यांकन को और अधिक प्रभावी बनाया जाए। जिस दिन प्रशासन समय को सबसे मूल्यवान संसाधन मान लेगा, उसी दिन भारत की विकास गति कई गुना बढ़ जाएगी। प्रधानमंत्री की सचिवों के साथ हुई बैठक को केवल एक औपचारिक सरकारी बैठक मानना भूल होगी। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के लिए स्पष्ट संदेश है कि आने वाला भारत पुरानी कार्यशैली से नहीं चलेगा। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब निर्णयों की गति, योजनाओं की गति और प्रशासन की गति तीनों एक समान हों।

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