भारतीय राजनीति और समाज में एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। ‘जेन-जी’ (Gen-Z) यानी साल 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई युवा आबादी अब देश की राजनीतिक और सामाजिक दिशा तय करने में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है।

यह एक ऐसी पीढ़ी है जो पारंपरिक नैरेटिव (कहानियों) को खारिज करती है, जो सीधे सवाल पूछती है, और जिसके लिए ‘नायक’ और ‘विलेन’ की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों, सोशल मीडिया ट्रेंड्स और मीम्स की दुनिया में एक बहुत ही अजीब लेकिन दिलचस्प कॉम्बिनेशन देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहाँ ‘कॉकरोच’ (एक रूपक/मीम के तौर पर) और राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव तथा चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ युवाओं के नए आइकन या नायक (Heroes) के रूप में प्रोजेक्ट हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दस सालों से सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार इस पीढ़ी के नैरेटिव में धीरे-धीरे एक विलेन (खलनायक) के रूप में तब्दील होती दिख रही है।

आइए समझते हैं कि इस सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के पीछे की मुख्य वजहें क्या हैं और क्यों जेन-जी का चश्मा पुरानी पीढ़ी से एकदम जुदा है। युवाओं की अजेय उत्तरजीविता (Survival) का प्रतीक ‘कॉकरोच’ (The Cockroach Theory) की – राजनीतिक किरदारों पर आने से पहले हमें इस लेख के सबसे अनोखे शब्द ‘कॉकरोच’ को समझना होगा। पहली नजर में यह एक घृणित कीट लग सकता है, लेकिन जेन-जी की इंटरनेट संस्कृति (Internet Culture) में कॉकरोच एक गहरे रूपक के तौर पर उभरा है। विज्ञान कहता है कि कॉकरोच परमाणु विस्फोट को भी झेल सकता है; वह बिना सिर के भी कई दिनों तक जिंदा रह सकता है। वह हर परिस्थिति में खुद को ढाल लेता है और उसे खत्म करना नामुमकिन है।
आज का भारतीय युवा खुद को इसी ‘कॉकरोच’ की तरह महसूस कर रहा है। पेपर लीक, बेरोजगारी, आर्थिक मंदी और सोशल मीडिया पर कड़े प्रतिबंधों के बावजूद युवा हार नहीं मान रहे हैं। वे व्यवस्था की मार झेलकर भी बार-बार उठ खड़े होते हैं। युवा इस टर्म का इस्तेमाल खुद को ‘सिस्टम-प्रूफ’ दिखाने के लिए कर रहे हैं। सरकार चाहे जितने कड़े नियम बना ले या अवसर कम कर दे, युवा रास्ता ढूंढ ही लेते हैं। यह रूपक उस दृढ़ता को दिखाता है जो मौजूदा सरकार की कठोर नीतियों के खिलाफ युवाओं ने अपने अंदर विकसित कर ली है।
वहीं जेन-जी के लिए राहुल गांधी आज की तारीख में सबसे बड़े री-ब्रांडेड नायक हैं। साल 2014 से 2019 के बीच जिस नेता को ट्रोल आर्मी ने ‘पप्पू’ साबित करने में पूरी ताकत झोंक दी थी, उसी राहुल गांधी को आज के युवा एक संजीदा, निडर और जमीनी नेता के रूप में देख रहे हैं। हजारों किलोमीटर पैदल चलकर लोगों से सीधे संवाद करने की राहुल की छवि ने युवाओं को प्रभावित किया। जेन-जी को स्क्रिप्टेड भाषणों से नफरत है; उन्हें राहुल की बेबाकी और सहजता पसंद आई। संसद में हाथ में लाल किताब (संविधान) लेकर सरकार की नीतियों को चुनौती देना, युवाओं के रोजगार और जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों को उठाना राहुल को युवाओं के करीब ले गया। यूट्यूबर्स के साथ इंटरव्यू, कुलियों, मैकेनिकों और छात्रों के साथ उनकी बिना किसी तामझाम की मुलाकातें सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम रील्स और शॉर्ट्स) पर खूब वायरल होती हैं। जेन-जी को एक ऐसा नेता चाहिए जो उनके जैसा दिखे, उनसे सीधे बात करे, न कि दूर किसी ऊंचे मंच से उपदेश दे।
अब बात प्रियंका गांधी वाड्रा की, प्रियंका गांधी वाड्रा ने खुद को एक ऐसी राजनेता के रूप में स्थापित किया है जो न केवल अपनी दादी इंदिरा गांधी की याद दिलाती हैं, बल्कि आधुनिक युवाओं की भाषा भी समझती हैं। हाथरस कांड हो, लखीमपुर खीरी हिंसा हो या महिला पहलवानों का प्रदर्शन—प्रियंका गांधी हमेशा पीड़ित पक्षों के साथ खड़ी नजर आईं। जेन-जी उस नेता को पसंद करता है जो केवल ट्वीट न करे, बल्कि जमीन पर उतरकर लाठियां खाने का माद्दा रखता हो। प्रियंका का ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ जैसा नारा सीधे तौर पर युवा युवतियों के दिल में उतरा। वह बेरोजगारी, महंगाई और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सीधे मोदी सरकार को घेरती हैं। उनका तीखा लेकिन शालीन अंदाज युवाओं को एक मजबूत विकल्प की उम्मीद देता है।
अखिलेश यादव ‘पीडीए’ और सोशल इंजीनियरिंग के नए उस्ताद बन कर उभरे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में भाजपा के अजेय रथ को रोकने वाले अखिलेश यादव आज के युवाओं, विशेषकर पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच एक बड़े रणनीतिकार बनकर उभरे हैं। अखिलेश ने पुरानी समाजवादी राजनीति को छोड़कर एक नया आधुनिक सोशल नैरेटिव दिया। उन्होंने युवाओं को समझाया कि उनके हक और नौकरियां क्यों छीनी जा रही हैं। पेपर लीक के मुद्दे पर अखिलेश यादव ने जिस तरह उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक सरकार को घेरा, उसने युवाओं को उनका मुरीद बना दिया। युवा जानते हैं कि सालों की मेहनत के बाद जब पेपर लीक होता है, तो उनका भविष्य अंधकार में चला जाता है। अखिलेश ने इस दर्द को अपनी राजनीति का मुख्य हथियार बनाया। सिडनी यूनिवर्सिटी से पढ़े अखिलेश यादव की छवि एक पढ़े-लिखे और विजनरी नेता की है, जो एक्सप्रेसवे और लैपटॉप की बात करता है। यह विकासवादी सोच जेन-जी को बहुत अपील करती है।
वंचितों की बुलंद और बेखौफ आवाज चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’, भीम आर्मी के प्रमुख और सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ आज के दलित, बहुजन और शोषित युवाओं के सबसे बड़े ‘रॉकस्टार’ राजनीतिक आइकन हैं। नीली चादर कंधे पर डाले, घनी मूंछों और बुलेट की सवारी करने वाले चंद्रशेखर पारंपरिक दबे-कुचले नैरेटिव को तोड़ते हैं। वह युवाओं को सिखाते हैं कि अपने हक के लिए गिड़गिड़ाना नहीं, बल्कि सीना तानकर लड़ना है। देश के किसी भी कोने में अगर किसी दलित या पिछड़े युवा पर अत्याचार होता है, तो चंद्रशेखर वहां सबसे पहले पहुंचते हैं। उनका यह ‘एक्शन-ओरिएंटेड’ व्यवहार जेन-जी को आकर्षित करता है, जो तुरंत नतीजे और न्याय देखना चाहती है।
संसद पहुंचने के बाद जिस तरह वे हाशिए के लोगों, अग्निवीर योजना के खिलाफ और छात्रों के अधिकारों पर बिना डरे बोलते हैं, उसने उन्हें युवाओं का एक प्रामाणिक (Authentic) नायक बना दिया है। वहीं अब युवाओं की नजर में ‘विलेन’ क्यों बनती जा रही है मोदी सरकार, साल 2014 और 2019 के चुनावों में नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी ताकत देश का युवा ही था। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और ‘अच्छे दिन’ के वादों ने युवाओं को मंत्रमुग्ध किया था। लेकिन 2026 तक आते-आते यह नैरेटिव पूरी तरह बदल चुका है। आखिर मोदी सरकार युवाओं की नजर में खलनायक क्यों बनती जा रही है? इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
क) बेरोजगारी का संकट और पेपर लीक की महामारी
आज के युवा के लिए सबसे बड़ा खलनायक वह सिस्टम है जो उसे रोजगार नहीं दे पा रहा। NEET, NET, रेलवे और विभिन्न राज्यों के पुलिस व शिक्षक भर्ती के पेपर लगातार लीक हो रहे हैं। सालों तक तैयारी करने वाले युवाओं का पैसा और उम्र दोनों बर्बाद हो रहे हैं। जब सरकार इस पर ठोस कदम उठाने के बजाय लीपापोती करती दिखती है, तो युवाओं का गुस्सा मोदी सरकार पर ‘विलेन’ के रूप में फूटता है।
ख) ‘अग्निवीर’ जैसी योजनाएं
सेना में जाने का सपना देखने वाले ग्रामीण और अर्ध-शहरी युवाओं के लिए ‘अग्निवीर’ योजना एक बड़ा झटका साबित हुई। केवल 4 साल की नौकरी और उसके बाद अनिश्चित भविष्य ने युवाओं के अंदर सरकार के प्रति गहरी नाराजगी पैदा की। विपक्ष (राहुल, अखिलेश और चंद्रशेखर) ने इस मुद्दे को लपका और युवाओं के नायक बन गए, जबकि सरकार को युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाली संस्था के रूप में देखा गया।
ग) अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला और असहमति को दबाना
जेन-जी इंटरनेट की आजादी, मीम्स बनाने की आजादी और सरकार की आलोचना करने के अधिकार को बेहद संजीदगी से लेता है। जब भी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पर शिकंजा कसा जाता है, पत्रकारों को जेल भेजा जाता है या छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर लाठियां चलाई जाती हैं, तो डिजिटल रूप से सक्रिय यह पीढ़ी सरकार को ‘तानाशाह’ और ‘विलेन’ के रूप में देखने लगती है।
घ) धार्मिक ध्रुवीकरण बनाम वास्तविक मुद्दे
आज का युवा (जेन-जी) तार्किक है। वह केवल धर्म और मंदिर-मस्जिद के नाम पर वोट देने को तैयार नहीं है। उसे बेहतर कॉलेज, विश्वस्तरीय अस्पताल, हाई-स्पीड इंटरनेट, और निष्पक्ष नौकरियां चाहिए। जब सरकार के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर रोजगार की बात करने के बजाय हिंदू-मुस्लिम डिबेट करते हैं, तो युवा खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। विपक्ष द्वारा ‘मुद्दों की राजनीति’ करना और सरकार द्वारा ‘भावनात्मक राजनीति’ करना—यही वो बिंदु है जहां नायक और विलेन की अदला-बदली हो जाती है।
भारतीय राजनीति का यह मोड़ बेहद दिलचस्प है। जहां कभी पारंपरिक मीडिया के जरिए स्थापित की गई छवियां सालों-साल चलती थीं, आज सोशल मीडिया, रील्स और मीम्स के दौर में युवा खुद अपनी धारणाएं बना रहे हैं। ‘कॉकरोच’ की तरह हर संकट को झेलकर जिंदा रहने की कसम खा चुका आज का युवा अब खोखले वादों से बहलने वाला नहीं है। उसे राहुल गांधी की सरलता, प्रियंका गांधी की सहानुभूति, अखिलेश यादव का विजन और चंद्रशेखर रावण की आक्रामकता अपने हकों की लड़ाई में मददगार नजर आती है। दूसरी तरफ, मोदी सरकार की नीतियां, नौकरियों की कमी और संवादहीनता उसे युवाओं के सपनों का दमन करने वाली ‘विलेन’ जैसी प्रतीत होने लगी हैं।
यह बदलाव किसी एक चुनाव की हार-जीत का नहीं है, बल्कि यह देश की सोच का बदलाव है। जो भी पार्टी या नेता जेन-जी के इस मिजाज, उनकी स्वतंत्रता की चाह और उनके रोजगार की जरूरत को नहीं समझेगा, वह आने वाले समय में इतिहास के पन्नों में विलीन हो जाएगा। युवा अब मूकदर्शक नहीं हैं; वे देश की पटकथा के खुद लेखक बन चुके हैं।

