हजारों करोड़ की परियोजनाओं पर राजनीतिक वाहवाही, 348 परियोजनाएं एक साल से ज्यादा लेट-रितेश सिन्हा

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सुरंग और पुल सम्मेलन-2026 में खराब गुणवत्ता वाली विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर और अपर्याप्त भूवैज्ञानिक आंकड़ों को परियोजनाओं की लागत बढ़ने, देरी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का कारण बताया है। यह बयान महज तकनीकी टिप्पणी नहीं है। यह उस विकास मॉडल पर गंभीर सवाल है जिसे मोदी सरकार अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करती रही है। जब सरकार हर नए एक्सप्रेसवे, पुल, सुरंग और राजमार्ग का श्रेय राजनीतिक रूप से लेती है, तब खराब योजना, बढ़ती लागत और सुरक्षा जोखिम की जिम्मेदारी भी उसी राजनीतिक नेतृत्व को लेनी होगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर डीपीआर खराब थी तो उसे मंजूरी किसने दी? भूवैज्ञानिक आंकड़े अपर्याप्त थे तो परियोजना आगे कैसे बढ़ी? सर्वेक्षण अधूरा था तो हजारों करोड़ रुपये के निवेश का फैसला किस आधार पर हुआ?

एनएचएआई ने वित्त वर्ष 2026-27 में 54 परियोजनाओं को लगभग ₹1,80,017 करोड़ की अनुमानित पूंजी लागत के साथ अवार्ड करने की योजना बनाई है। इन परियोजनाओं की कुल लंबाई लगभग 2,442 किलोमीटर है। लेकिन तुलना कीजिए—2025-26 में एनएचएआई ने 124 परियोजनाओं, 6,376 किलोमीटर और ₹3,45,466 करोड़ की परियोजना पाइपलाइन चिन्हित की थी। यानी एक ही साल में परियोजनाओं की संख्या करीब 56 प्रतिशत और लंबाई करीब 62 प्रतिशत घट गई, जबकि प्रस्तावित पूंजीगत लागत में लगभग 48 प्रतिशत की कमी आई। संसद में दिसंबर 2025 में सरकार ने खुद बताया था कि 348 निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं अपनी मूल संविदात्मक समय सीमा से एक वर्ष से अधिक पीछे चल रही थीं। सीएजी ने एनएचएआई की 23 परियोजनाओं में दायरा बदलने के कारण 856.80 करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च का उल्लेख किया था, जिसमें 662.53 करोड़ रुपये की राशि खराब डीपीआर/फीजिबिलिटी रिपोर्ट से जुड़ी थी। इसका मतलब साफ है—खराब डीपीआर कोई काल्पनिक खतरा नहीं है। सरकारी ऑडिट में इसका आर्थिक असर दर्ज हो चुका है।
सरकार अगर परियोजनाओं की संख्या, लागत और लंबाई को अपनी उपलब्धि बताती है तो विपक्ष को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि कितनी परियोजनाओं में मूल डीपीआर बदली गई, कितनी की लागत बढ़ी और कितनी समयसीमा से पीछे चली गईं?लोकतंत्र में श्रेय और जवाबदेही अलग-अलग नहीं हो सकते। मोदी सरकार ने बुनियादी ढांचे के लिए बड़ा बजट रखा है। 2026-27 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को ₹3,09,875 करोड़ का आवंटन किया गया है, जिसमें अकेले एनएचएआई के लिए ₹1,87,293 करोड़ यानी मंत्रालय के कुल आवंटन का करीब 60 प्रतिशत है। सड़कों और पुलों के लिए ₹1,21,999 करोड़ का प्रावधान है। मोदी सरकार ने बुनियादी ढांचे को अपनी राजनीति का केंद्रीय स्तंभ बनाया है। ‘विकसित भारत’ की तस्वीर में एक्सप्रेसवे, हाईवे, वंदे भारत, पुल और सुरंगें प्रमुख प्रतीक हैं। लेकिन विकास की असली कसौटी यह नहीं कि किसी परियोजना का उद्घाटन कितने समय में हो गया। असली सवाल यह है कि वह परियोजना कितने वर्षों तक सुरक्षित और टिकाऊ रहती है और उसे बनाने में मूल अनुमान से कितनी अतिरिक्त सार्वजनिक राशि खर्च हुई।
गडकरी का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे सरकार के भीतर से यह सवाल उठा रहे हैं। यदि यही आरोप विपक्ष लगाता तो सत्ता पक्ष उसे राजनीति कहकर खारिज कर सकता था। लेकिन जब केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री खुद खराब डीपीआर को लागत, देरी और सुरक्षा से जोड़ रहे हैं तो सरकार को जवाब देना ही होगा। सबसे ज्यादा चिंता हिमालयी क्षेत्र को लेकर होनी चाहिए। हिमालय में सड़क और सुरंग परियोजनाएं सामान्य निर्माण परियोजनाएं नहीं हैं। भूस्खलन, भूकंप, बर्फबारी, जलधाराएं, अचानक मौसम परिवर्तन और अस्थिर भूगर्भीय संरचना हर परियोजना के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा करती है। यहां गलत भूवैज्ञानिक आंकड़ा किसी बजट फाइल की छोटी गलती नहीं है। वह निर्माण स्थल पर जानलेवा गलती बन सकता है। रणनीतिक परियोजनाओं की डीपीआर में लापरवाही को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखना होगा।
इसी बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 13,041 करोड़ रुपये की पांच परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इनमें चार रेलवे मल्टीट्रैकिंग परियोजनाएं और बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग-22 के मुजफ्फरपुर – सीतामढ़ी-सोनबरसा खंड का चार लेन में उन्नयन शामिल है। चार रेलवे परियोजनाओं की अनुमानित लागत 9,450 करोड़ रुपये है और इनसे लगभग 410 किलोमीटर का अतिरिक्त ट्रैक नेटवर्क विकसित होगा। इन्हें 2030-31 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इन परियोजनाओं का आर्थिक महत्व भी बड़ा है। सरकार के अनुसार इससे लगभग 60 लाख आबादी वाले 6,448 गांवों की कनेक्टिविटी बेहतर होगी और कोयला, लौह अयस्क, सीमेंट, इस्पात, कंटेनर, ऑटोमोबाइल तथा अनाज जैसे माल की आवाजाही को गति मिलेगी। तीन परियोजनाएं महत्वपूर्ण हावड़ा-चेन्नई रेल मार्ग से जुड़ी हैं और क्षमता में वृद्धि का उद्देश्य यात्री एवं माल परिवहन को अधिक कुशल बनाना है।
सरकार को बताना चाहिए कि इन परियोजनाओं की डीपीआर में यातायात का अनुमान किस आधार पर तैयार हुआ है, भूमि और पर्यावरण संबंधी बाधाओं का आकलन कितना वास्तविक है और भविष्य में लागत बढ़ने की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी। बिहार में 82.57 किलोमीटर लंबे मुजफ्फरपुर- सीतामढ़ी-सोनबरसा एनएच-22 खंड को चार लेन करने की परियोजना की लागत 3,590.73 करोड़ रुपये बताई गई है। यह सड़क आर्थिक ही नहीं, नेपाल सीमा की दिशा में संपर्क के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। उत्तर बिहार में सड़क की चौड़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसकी जल निकासी, बाढ़ से सुरक्षा, मिट्टी की प्रकृति और पुल-पुलियों की क्षमता। अगर डीपीआर में इन पहलुओं का पर्याप्त वैज्ञानिक आकलन नहीं हुआ तो आज की 3,590 करोड़ रुपये की परियोजना कल अतिरिक्त लागत और मरम्मत का नया बोझ बन सकती है।
सीएजी ने भारतमाला परियोजना की जांच में भी योजना और क्रियान्वयन से जुड़े गंभीर सवाल उठाए थे। सीएजी के अनुसार भारतमाला चरण-1 के लिए निर्धारित 70,050 किलोमीटर में से 34,972 किलोमीटर यानी लगभग 49 प्रतिशत सड़कें पहले से विकसित या विभिन्न योजनाओं के तहत अवार्ड की जा चुकी थीं।सीएजी की दूसरी रिपोर्ट में एक राजमार्ग परियोजना के उदाहरण में यह भी सामने आया कि छह लेन की योजना यातायात की जरूरत के मुकाबले अधिक क्षमता वाली थी और चार लेन की तुलना में अनुमानित सिविल लागत में लगभग 653 करोड़ रुपये का अंतर था। पुरानी सीएजी ऑडिट में तो मामला और भी चौंकाने वाला था। कुछ राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में वास्तविक निष्पादन लागत मूल स्वीकृत लागत से 12.26 प्रतिशत से 86.82 प्रतिशत तक अधिक पाई गई थी। एक मामले में डीपीआर में अनुमानित और वास्तविक मात्रा में भारी अंतर सामने आया। यह आंकड़ा बताता है कि डीपीआर केवल सरकारी फाइल का एक दस्तावेज नहीं है। यही वह दस्तावेज है जिसके आधार पर हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक दिशा तय होती है। अगर इसमें गलती है तो पूरी परियोजना की आर्थिक गणित संदिग्ध हो जाती है।
एक और गंभीर उदाहरण भारत-नेपाल सीमा सड़क परियोजना का है। सीएजी ने 1,377 किलोमीटर की इस परियोजना में योजना, वित्तीय प्रबंधन, ठेका प्रबंधन और क्रियान्वयन की कमियों को रेखांकित किया था। परियोजना की मूल समयसीमा मार्च 2016 थी, जिसे बाद में दिसंबर 2022 तक बढ़ाया गया। मार्च 2021 तक राज्यों को 1,709.17 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके थे, जबकि परियोजना की मूल स्वीकृत लागत 3,853 करोड़ रुपये थी। गडकरी ने गुणवत्ता पर जोर दिया है और यह भी कहा गया है कि खराब योजना, निर्णय लेने में देरी और जवाबदेही की कमी परियोजनाओं में देरी और लागत बढ़ने का कारण बनती है। उन्होंने खराब गुणवत्ता का काम करने वाले ठेकेदारों पर कार्रवाई और जरूरत पड़ने पर उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की बात भी कही है। सवाल ठेकेदार तक सीमित नहीं है। खराब काम करने वाला ठेकेदार दोषी है तो खराब डीपीआर बनाने वाला सलाहकार और उसे मंजूर करने वाला अधिकारी भी जवाबदेह क्यों नहीं?
अगर किसी परियोजना का उद्घाटन प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री करते हैं तो उसका राजनीतिक श्रेय सत्ता को मिलता है। अगर परियोजना समय पर पूरी होती है तो उपलब्धि सरकार की होती है। अगर सड़क की लंबाई बढ़ती है तो विज्ञापन सरकार का होता है। फिर अगर डीपीआर में गलती निकलती है, लागत बढ़ती है और परियोजना वर्षों तक अटकती है तो जवाबदेही भी सरकार की ही होनी चाहिए। देश को तेज विकास चाहिए, लेकिन तेज विकास के नाम पर तकनीकी सावधानी की बलि नहीं दी जा सकती। सरकार को तीन सवालों का जवाब देना चाहिए—पहला, पिछले 10 वर्षों में कितनी बड़ी सड़क और सुरंग परियोजनाओं में डीपीआर संशोधित हुई? दूसरा, मूल अनुमान से कितनी लागत बढ़ी? तीसरा, उन मामलों में किस अधिकारी, सलाहकार या एजेंसी की जवाबदेही तय हुई? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक हर नई परियोजना की घोषणा के साथ जनता को यह पूछने का अधिकार रहेगा कि यह विकास है या आंकड़ों की राजनीति?




