डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

यह चाँदगढ़ का वही ऊँचा, पुराना और ख़ामोश डाक बँगला था जिसकी दीवारों से पहाड़ों की सदियों पुरानी तन्हाई लिपटी हुई थी। वादियों में सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और सर्द हवा के तेज़ झोंकों के साथ वादी पर ख़ामोशी की एक चादर फ़ैलने लगी थी।बहैसियत एक मुसन्निफ़ (लेखक), मुझे क़ुदरत के इन हसीन और बेसाख़्ता मनाज़िर, पहाड़ों की बलखाती पगडंडियों पर बिना किसी मक़सद के घूमने, और अपने गिर्द-ओ-पेश (आस-पास) बिखरे हुए छोटे-छोटे तजरबों को तहरीर (लेखन) के क़ालिब में ढालने का जुनून है। मुझे लगता है कि हर पहाड़ी बस्ती, वहाँ का हर मोड़ और किसी पुराने डाक बँगले का हर दर-ओ-दीवार अपने सीने में एक अनकहा अफ़साना छुपाए बैठा होता है। इसी अदबी जुस्तजू (साहित्यिक खोज) और सुकून की तलाश में, मैं अपनी कार ड्राइव करता हुआ चाँदगढ़ की इन बुलंदियों पर वाक़ै (स्थित) इस वीरान से डाक बँगले में पहुँचा था। डाक बँगला देखकर ऐसा लगता था जैसे दहाइयों (दशकों) से यहाँ वक़्त ठहर गया हो। गिर्द-ओ-पेश न तो कोई मुलाज़िम नज़र आ रहा था और न ही कोई और मुसाफ़िर। सन्नाटा इतना गहरा था कि दूर किसी गहरी वादी में बहते आबशार (झरने) की गूँज साफ़ सुनाई दे रही थी। मैं अभी कार से बाहर निकलकर गिर्द-ओ-पेश के सेहर-अंगेज़ (जादुई) माहौल का जायज़ा ही ले रहा था कि एक दमकते चेहरे और जल्दी-जल्दी क़दम उठाते हुए नौजवान पर मेरी नज़र पड़ी।

साहब जी! मैं शकूरा हूँ। उसने एक पुरख़ुलूस (सच्ची) और बेसाख़्ता मुस्कुराहट के साथ मेरा इस्तक़बाल (स्वागत) किया। क़ब्ल इसके कि मैं कुछ कहता, उसने मेरी गाड़ी की डिग्गी से सामान उठाया और बड़ी अपनायत से अंदर कमरे की तरफ़ बढ़ गया। मैं उसकी फुर्ती और ख़ुश-अख़लाक़ी देखकर मुतअस्सिर (प्रभावित) हो गया। इस डाक बँगले की पुर-असरार (रहस्यमयी) ख़ामोशी में शकूरा की मौजूदगी ने एक अजीब सी गर्मजोशी भर दी थी। सामान कमरे में तरीक़े से रखने के बाद वह दोबारा सामने आया और बोला, “साहब जी, पहाड़ों में शाम बहुत जल्दी ढलती है और ठंड बढ़ जाती है। आप हाथ-मुँह धो लें, मैं आपके लिए कड़क कॉफ़ी बनाकर लाता हूँ।” कुछ ही देर में वह एक ट्रे में गरम-गरम कॉफ़ी के दो मग लिए लौट आया। बाहर बादल धीरे-धीरे डाक बँगले के बरामदे को छूने लगे थे और अंदर हम दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया। “शकूरा, इस डाक बँगले में तुम्हारे अलावा कोई और दिखाई नहीं दे रहा?” मैंने कॉफ़ी का पहला घूँट लेते हुए पूछा। उसने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया, “साहब जी, इधर अब ज़्यादा लोग नहीं आते। बस आप जैसे कुछ लोग जो सुकून और ख़ामोशी की तलाश में होते हैं, वह यहाँ तक पहुँच जाते हैं। बाक़ी इस डाक बँगले को सँभालना, इसकी देख-रेख करना और आने-जाने वालों की ख़ातिर-तवाज़ो करना… बस यही मेरी दुनिया है।” बाज़ौक़ और क़ुदरत से मोहब्बत करने वाले शख़्स को अगर कोई अच्छा सुनने वाला या सच्चा इंसान मिल जाए तो बातें ख़त्म नहीं होतीं। शकूरा के साथ मुख़्तसर (छोटी सी) मुलाक़ात में ही एक अजीब सा तअल्लुक़ क़ायम हो गया। उसके लहज़े की सादगी, पहाड़ी ख़ुलूस और बातचीत के अंदाज़ ने मेरा दिल जीत लिया। उसकी मासूम बातों में पहाड़ों का वह सच था जो अक्सर शहरों के शोर में कहीं खो जाता है। कॉफ़ी का कप ख़ाली हो चुका था, लेकिन बातों की रोशनी में वह वीरान डाक बँगला अब मुझे अकेला नहीं लग रहा था।

डाक बँगले की बुलंदी पर ठहरे हुए मुझे कई दिन बीत चुके थे। वह इमारत पहाड़ की इतनी ऊँचाई पर वाक़ै थी कि वहाँ से नीचे फैली वादियों का मंज़र किसी मुसव्विर (चित्रकार) के शाहकार (उत्कृष्ट रचना) जैसा दिखाई देता था। सुबह के वक़्त जब बादल ज़रा छँटते, तो नीचे बिखरे हुए छोटे-छोटे गाँव, उनके रंग-बिरंगे मकान और खेत इतने ख़ूबसूरत और दिलकश लगते कि मैं घंटों बरामदे में बैठकर उन्हें तकता रहता। एक दिन जब क़ुदरत का यह दिलनशीं मंज़र देखते हुए मेरा दिल चाहा कि इन वादियों को क़रीब से महसूस किया जाए, तो मैंने शकूरा से अपनी इस ख़्वाहिश का इज़हार किया। “शकूरा! इस बुलंदी से यह नीचे के गाँव कितने ख़ुशनुमा लगते हैं। क्यों न तुम मुझे इन रास्तों और वादियों की तरफ़ ले चलो?” शकूरा ने अपने मख़सूस (खास) पुरख़ुलूस अंदाज़ में फ़ौरन सर हिलाया और बोला, “साहब जी, यह तो बहुत अच्छी बात है। पहाड़ों का असली हुस्न तो इन्हीं नीचे बिखरी हुई आबादियों में है। कल सुबह नाश्ते के बाद चलते हैं!” अगली सुबह हवा में अच्छी-खासी ठंड थी। मैंने अपना गरम स्वेटर पहना, गले में मफ़्लर लपेटा और अपने लिखने-पढ़ने के काम और डायरी का हिसाब-किताब मुकम्मल कर ही रहा था कि शकूरा दरवाज़े पर दस्तक़ देकर अंदर आ गया। “साहब जी, तैयारी हो गए? चलिए, आज आपको पहाड़ों के असल रंग दिखाता हूँ।” हम दोनों डाक बँगले की ऊँचाई से नीचे की तरफ़ उतरने वाली तंग और बलखाती पगडंडियों पर क़दम बढ़ाने लगे। नाहमवार (उबड़-खाबड़) रास्ते, ख़ुश्क पत्तों की सरसराहट और दोनों तरफ़ फैले सनोबर और चीड़ के दरख़्त (पेड़) एक अलग ही सेहर (जादू) जगा रहे थे। ज्यों-ज्यों हम नीचे उतर रहे थे, सुबह की निखरी हुई धूप और सर्द हवा का लम्स (स्पर्श) रूह को एक अजीब सा सुकून बख़्श रहा था। शकूरा आगे-आगे चलते हुए मुझे रास्ते में आने वाले हर मोड़, दरख़्त और दूर नज़र आने वाले चरवाहों के बारे में क़िस्से सुनाता जा रहा था। पगडंडियों से उतरते-उतरते हम एक ऐसे इलाक़े में आ पहुँचे, जहाँ अब गाँव के पक्के मकानों की बजाय कुछ क़बायली(आदिवासी) बस्तियों का सिलसिला शुरू हो चुका था।
मिट्टी के बने हुए छोटे-छोटे ख़ूबसूरत घर, जिनकी छतों पर घास और लकड़ियाँ सजाई गई थीं, और दीवारों पर क़ुदरती रंगों से बने रवायती नक़्श-ओ-निगार यह सब देखकर यूँ लगता था जैसे इंसान और क़ुदरत एक-दूसरे के बहुत क़रीब आ गए हों। सोंधी मिट्टी की ख़ुशबू, आँगन में जलती हुई लकड़ियों का धुआँ और इस माहौल की सादगी दिल को छू रही थी। शकूरा इन लोगों से ब-ख़ूबी वाक़िफ़ था, क्योंकि वह उसी इलाक़े का रहने वाला था। उसको देखकर बस्ती के कुछ लोग मुस्कुराए और आगे बढ़कर गर्मजोशी से मिले। “साहब जी, यह हमारे इलाक़े के पुराने आदिवासी लोग हैं,” शकूरा ने एक छोटे से आँगन के पास रुकते हुए बताया, “इनकी ज़िंदगी बहुत सादा है, मगर इनका दिल पहाड़ों से भी बड़ा होता है।” इन लोगों ने बड़ी सादगी और अपनायत से हमें मिट्टी के चबूतरे पर बैठने को कहा। एक बुज़ुर्ग आदिवासी ने, जिनके चेहरे की झुर्रियों में वक़्त और तजरबे की दास्तानें दर्ज थीं, मिट्टी के प्यालों में गरम-गरम लाल चाय पेश की। वहाँ बैठकर मैंने महसूस किया कि शहरी ज़िंदगी की भाग-दौड़ के बग़ैर भी यह लोग कितनी ख़ुशी और सुकून से ज़िंदगी बसर कर रहे थे। हम चाय पीकर वापस डाक बँगले की सम्त (दिशा) क़दम बढ़ा ही रहे थे कि अचानक एक छोटे से कच्चे मकान की लकड़ी के दरवाज़े से एक इंतहाई ख़ूबसूरत आदिवासी लड़की झाँकती हुई बाहर आई। उसके रूप में एक अजीब सी चमक थी,वह नादान भी थी और उसकी उम्र के इस मोड़ पर एक अलेहड़पन भी था जो पहाड़ी हवाओं की तरह बेसाख़्ता होता है। उसका आदिवासी पहनावा, गले में बिखरे रंग-बिरंगे मनकों के हार, हाथों में चूड़ियाँ, और बालों में सजा जंगली फूल उसके हुस्न को क़ुदरत का एक नायाब हिस्सा बना रहे थे। उसका रूप किसी बनावट का मोहताज नहीं था, बल्कि ऐसा लगता था जैसे पहाड़ों की पाकीज़गी उसके चेहरे पर सिमट आई हो।
उसने बड़ी बेबाकी से शकूरा को अपनी तरफ़ इशारा किया। शकूरा उसके बुलाने पर फ़ौरन उसकी तरफ़ बढ़ गया। वहीं पास में उसका बाप,एक वयोवृद्ध आदिवासी,चिलम लिए बैठा था, लेकिन उसने इस सब पर कोई ख़ास तास्सुरात (भाव) नहीं दिए, जैसे यह उनके रोज़मर्रा के तअल्लुक़ात का एक आम सा हिस्सा हो। जब वह लड़की और शकूरा आपस में कुछ हल्की-फुल्की बातें कर रहे थे, तो उस लड़की की शर्मीली निगाहें, उसकी मासूम अदाएँ और मुस्कुराते हुए चेहरे का उतरना-चढ़ना मेरे दिल के कैनवास पर रंगों का एक तूफ़ान बरपा कर रहा था। बहैसियत एक मुसन्निफ़, मैंने ख़ूबसूरती के कई रूप देखे और लिखे थे, लेकिन क़ुदरत की इस ख़ामोश वादी में खिलने वाला यह आदिवासी कँवल मेरे दिल में एक हसरत, एक सपने की तरह बिखरने लगा। डाक बँगले की तरफ़ वापसी का सारा रास्ता ख़ामोशी में कट गया। मैं शकूरा के पीछे-पीछे चलता रहा, मगर दिल में एक अजीब उथल-पुथल मची हुई थी। कई बार ज़बान पर आया कि उससे उस आदिवासी लड़की के बारे में कुछ पूछूँ, लेकिन फिर ज़हन में ख़याल आया कि कहीं शकूरा मेरे बारे में कुछ और न सोच बैठे। एक नामलूम सा झिझक का एहसास मुझ पर हावी रहा और मैंने ख़ामोश रहना ही मुनासिब समझा। शाम ढली और वादी पर तारीख़ी (अंधेरा) फैल गई। शकूरा ने हमेशा की तरह खाना पेश किया और अपने कमरे की तरफ़ चला गया। मगर मेरे अंदर एक तूफ़ान बरपा था। मैं बिस्तर पर लेटा रहा, करवटें बदलता रहा, मगर नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी। मेरा दिल बार-बार उसी कच्चे मकान की ड्योढ़ी की तरफ़ लौट रहा था। रात का आख़िरी पहर भी यूँ ही जागते हुए बीत गया।
एक-दो रोज़ यूँ ही बेचैनी में गुज़र गए। दिन को भी वादी के मनाज़िर में मेरा दिल न लगता और रातों की नींद खो चुकी थी। मेरा यह बदला हुआ रूप और ख़ामोशी शकूरा से छुप न सकी। एक दिन शाम के वक़्त जब वह चाय का मग रख रहा था, तो उसने ग़ौर से मेरे चेहरे को देखा। उसके लहजे में सच्ची हमदर्दी थी। “साहब जी…!” उसने धीमे से पुकारा, “क्या बात है साहब? आप दो दिन से बहुत ख़ामोश और बेचैन से लग रहे हैं। आपकी तबियत तो ठीक है न?” मैंने चाय का मग उठाया ताकि अपनी नज़रें छुपा सकूँ, लेकिन मेरे चेहरे की बेताबी शकूरा के लिए एक अनकहा इशारा थी। उसी रात, जब रात के क़रीब ग्यारह बज रहे होंगे, अचानक बादलों की गरज के साथ इंतहाई तेज़ और धुआँधार बरसात शुरू हो गई। पहाड़ों पर ऐसी तूफ़ानी बारिश में यूँ लगता था जैसे आसमान का कोई बंद टूट गया हो। खिड़की के शीशों पर बारिश की बूँदें चाबुक की तरह पड़ रही थीं। मेरा दिल पहले ही बेचैन था, और इस तूफ़ानी रात ने अंदर की उथल-पुथल को और बढ़ा दिया। मैं खिड़की के पास खड़ा बाहर तेज़ बारिश को तक रहा था और ज़हन में बार-बार वही सवाल घूम रहा था—इस तूफ़ानी बारिश में नीचे वादी में, उस कच्चे मकान की छत तले वह आदिवासी लड़की और उसका बूढ़ा बाप कैसे होंगे? उसी वक़्त, बाहर बरामदे से हल्की सी आहट हुई और साए की तरह एक सूरत दरवाज़े पर नमूदार हुई। वह शकूरा था, जिसके हाथ में लालटेन थी और चेहरे पर तश्वीश (चिंता)। “साहब जी…!” उसने बारिश के शोर में कहा, “बहुत तेज़ तूफ़ान है। डाक बँगले की बिजली कट गई है।” थोड़ी देर बाद बरामदे में फिर किसी के क़दमों की आहट हुई। बारिश का शोर अब भी था, मगर इस बार शकूरा अकेला नहीं था,उसके साथ वही बूढ़ा आदिवासी और वह ख़ूबसूरत लड़की भी मौजूद थी!
दोनों सर से पाँव तक पानी में बिल्कुल भीगे हुए थे। बारिश की बूँदें उनके कपड़ों और बालों से टपक रही थीं और वे ठंड से हल्का-हल्का काँप रहे थे।
क़ब्ल इसके कि मैं हैरत से कुछ पूछता, शकूरा आगे बढ़ा और बोला, “साहब जी! नीचे नाले का पानी उतर आया है और उनके कच्चे घर में पानी भर गया है। इस तूफ़ानी रात में अब वे वहाँ नहीं रह सकते… उन्हें आज रात यहीं रुकना होगा!” “हाँ हाँ, बिल्कुल! उन्हें फ़ौरन अंदर लाओ,” मैंने बेसाख़्ता कहा। मैंने जल्दी से अपनी अलमारी खोलकर अपना एक स्वेटर, कुछ गरम कपड़े और एक साफ़ तौलिया उनकी तरफ़ बढ़ाया। बूढ़े ने शुक्रिया के अंदाज़ में हाथ जोड़े, जबकि उस लड़की ने शर्माकर तौलिया थाम लिया। उसने जब अपने भीगे हुए घने बालों को तौलिये से पोंछना शुरू किया, तो बालों से टपकती पानी की बूँदें लालटेन की ज़र्द और धीमी रोशनी में यूँ चमक रही थीं जैसे शबनम (ओस) के चाँदी जैसे मोती हों। शकूरा ने कमरे के एक कोने में रखी अँगीठी में लकड़ियाँ सजाईं और आग जला दी। थोड़ी ही देर में आग के शोले नाचने लगे और कमरे में एक गर्मजोश सी रोशनी फैल गई। वह तूफ़ानी रात यूँ ही जागते हुए और बातें करते हुए बीतने लगी। इसी असना (दौरान) में, मेरी नज़रों ने एक गहरा राज़ भाँप लिया—शकूरा और वह लड़की, अँगीठी की रोशनी में, एक-दूसरे से नज़रें बचा-बचाकर देख रहे थे। उनकी ख़ामोश निगाहों में एक अनकही सच्चाई थी, एक गहरा ज़ज्बाती तअल्लुक़ था जो ज़बान से अदा किए बग़ैर भी साफ़ महसूस हो रहा था।
उन दोनों के बीच क्या था? शायद मोहब्बत का वही पाकीज़ा रिश्ता जो पहाड़ों की इन पाक वादियों में चुपके से पनपता है। मगर दूसरी तरफ़… मेरा अपना दिल भी इस ज़ज्बाती समंदर में डूब रहा था। मैं, जो सिर्फ़ एक मुसन्निफ़ बनकर क़ुदरत के नज़ारे लिखने आया था, उस लड़की के जादू और अपने दिल में उभरती हुई आरज़ुओं की कश्मकश में ख़ुद को खोता हुआ महसूस कर रहा था।
सुबह की पहली रोशनी फूटने से पहले ही बारिश बिल्कुल थम चुकी थी। बादल छँट चुके थे और वादी के ऊपर आसमान पर चाँद अपनी पूरी आब-ओ-ताब (चमक-दमक) के साथ चमक रहा था। पहाड़ों की पथरीली और ढलान ज़मीनों पर बारिश का कोई नाम-ओ-निशान तक बाक़ी नहीं रहा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। चाँद की ज़र्द और पारदर्शी रोशनी में वह ख़ामोश डाक बँगला और गिर्द-ओ-पेश की वादियाँ किसी ख़्वाब की तरह धुली हुई नज़र आ रही थीं। मैं बरामदे में आकर अकेला खड़ा हो गया। सर्द हवा का एक झोंका मेरे चेहरे से टकराया तो मेरे अंदर का मुसन्निफ़ बेदार (जागृत) हुआ, और ज़हन में एक ही सवाल बार-बार गूँजने लगा, “क्या मैं ग़लती कर रहा था?” रात की अँगीठी के सामने मैंने शकूरा और उस आदिवासी लड़की की आँखों में एक-दूसरे के लिए जो बेसाख़्ता सच्चाई, मान और सदियों पुराना तअल्लुक़ देखा था, उसके बाद मेरे दिल में उभरने वाली आरज़ूएँ मुझे एक गुनाह की तरह लगने लगी थीं।
वह लड़की इस वादी का, इस मिट्टी का, और शकूरा की ख़ामोश मोहब्बत का हिस्सा थी,मासूम, पुर-सुकून और पाकीज़ा! और मैं? मैं तो शहर का एक ऐसा मुसाफ़िर और मुसन्निफ़ था जो यहाँ सिर्फ़ कुछ दिन ठहरने, क़ुदरत को महसूस करने और कहानियाँ चुनने आया था। इंसान की सच्ची ज़ज्बाती दुनिया में अपनी आरज़ी (अस्थाई) पसंद की धूल उड़ाना यक़ीनन एक ग़लती थी। पथरीली ज़मीन पर जिस तरह बारिश का पानी नहीं ठहरता, उसी तरह मुझे भी महसूस हुआ कि मेरे दिल की यह आरज़ी उथल-पुथल अब छँट जानी चाहिए। मुझे एहसास हुआ कि हर ख़ूबसूरत चीज़ को पाने की आरज़ू करना ज़रूरी नहीं होता,कुछ रूप, कुछ लम्हे और कुछ जज़्बे सिर्फ़ इसलिए होते हैं कि उन्हें दूर से देखा जाए, महसूस किया जाए, और अपने क़लम की रोशनी से हमेशा के लिए अमर कर दिया जाए। सुबह की सफ़ेदी के साथ ही बूढ़ा आदिवासी और वह लड़की, अपने दिलों में डाक बँगले की गर्मजोशी का शुक्रिया लिए, वापस अपनी वादी की तरफ़ लौटने के लिए तैयार थे। जब वह लड़की ड्योढ़ी से बाहर निकलने लगी, तो उसने एक लम्हे के लिए पलटकर देखा। उसके चेहरे पर वही अलेहड़पन था, मगर आँखों में रात की उस तूफ़ानी पनाह का एहतेराम (आदर) और शकूरा के लिए एक ख़ामोश पयाम (संदेश) था। मैंने मुस्कुराकर उसे अलविदा कहा।
उनके जाने के बाद, मैंने बरामदे की मेज़ पर अपनी डायरी खोली। क़लम उठाया और काग़ज़ पर लफ़्ज़ बहने लगे, “पहाड़ों की बुलंदियाँ सिर्फ़ पत्थरों से नहीं बनतीं, उनके सीने में शकूरा और उस आदिवासी लड़की जैसे सच्चे और ख़ामोश जज़्बे धड़कते हैं। तूफ़ान आते हैं, रास्ते जल-थल होते हैं, मगर जो मोहब्बत अँगीठी की धीमी आँच में ख़ामोशी से परवान चढ़ती है, उस पर वक़्त की धूल नहीं जमती…”थोड़ी देर में, शकूरा चाय का कप लिए बरामदे में आया। उसके चेहरे पर एक झिझक और शर्मिंदगी का हल्का सा साया था, जैसे उसे डर हो कि रात का राज़ मुझ पर अयाँ (ज़ाहिर) हो चुका है। मैंने डायरी बंद की, चाय का कप थामा और उसके कंधे पर बड़ी अपनायत से हाथ रखा। “शकूरा!” मैंने वादी की तरफ़ देखते हुए कहा, “चाँदगढ़ का यह डाक बँगला अब मेरे लिए वीरान नहीं रहा। यहाँ की हवाओं में एक सच्ची कहानी की महक है। तुम दोनों का यह राज़ इस वादी की तरह ही पाकीज़ा है… अपना और उसका ख़याल रखना।” शकूरा ने हैरत और मम्नूनियत (कृतज्ञता) से मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में नमी तैरने लगी और उसने आहिस्ता से अपना सर झुका लिया,बग़ैर कुछ कहे, वह सब कुछ समझ गया था।
कुछ देर बाद, मैंने अपनी गाड़ी स्टार्ट की। शकूरा ने मेरा सामान गाड़ी में रखा और डाक बँगले के गेट पर खड़ा होकर हाथ हिलाने लगा। दूर, पहाड़ी पगडंडी के मोड़ पर, मिट्टी के एक कच्चे मकान के पास वह आदिवासी लड़की भी खड़ी थी, जिसका पहनावा धूप में चमक रहा था। गाड़ी जैसे-जैसे नीचे की तरफ़ ढलान पर उतर रही थी, चाँदगढ़ का वह ऊँचा डाक बँगला और पहाड़ों के वह साए मेरे पीछे छूट रहे थे। लेकिन मेरे साथ मेरी डायरी के सफ़ों (पन्नों) में एक ऐसा क़लमबंद अफ़साना था, जो अब एक ख़ुशबूदार याद बनकर मेरी रूह में महक रहा था। मैं एक काल्पनिक/अस्पष्ट सी आरज़ू हारकर, अदब (साहित्य) और मोहब्बत का एक लाज़वाल (अमर) शाहकार जीत चुका था।




